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सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

दिखें ये 8 संकेत, तो जान लें कि आपके किडनी में है स्टोन !

दिखें ये 8 संकेत, तो जान लें कि आपके किडनी में है स्टोन !

किडनी स्टोन होने पर असहनीय दर्द होता है। अगर इस दर्द से बचना चाहते है, तो पहले से जान लें ये संकेत। जिससे इससे आसानी से पा सकते निजात...

आज के समय में दुनियाभर में किडनी के मरीज दिनों-दिन बढ़ते जा रहे है। वह मेडिकल साइंस की बात करें तो इसे क्रॉनिक कि़डनी डिजीज कहते है। इस बीमारी को लेकर जागरुकता फैलाने के लिए 8 मार्च को पुरी दुनिया में वर्ल्ड किडनी डे मनाया जाता है। आज किडनी दिवस में जानिए ऐसे संकेतो के बारें में जिससे आप खुद को फिट रख सके।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक, 13 प्रतिशत पुरुषों और सात प्रतिशत महिलाओं में गुर्दे की पथरी की समस्या पाई जाती है। आईएमए के अनुसार, पूरे दिन में तरल पदार्थो का सेवन बढ़ाने से गुर्दे की पथरी के बार-बार होने का जोखिम आधा रह जाता है और इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता।
 

गलत खान-पान व जरुरत से कम पानी पीना किडनी की पथरी का अहम कारण है। शरीर में पानी की कमी किडनी की पथरी का मुख्य कारण है। यूरिक एसिड (मूत्र का एक घटक) पतला करने के लिए पर्याप्त पानी चाहिए होता है और ऐसा न होने पर मूत्र अधिक अम्लीय बन जाता है। यह अम्लीय किडनी की पथरी बनने का कारण होता है। किडनी की पथरी गोल्फ की एक गेंद के रूप में बड़ी हो सकती है। यह एक क्रिस्टल जैसी संरचना होती है। जिसमें असहनीय दर्द होता है।

अगर आप किडनी के स्टोन से बचना चाहते है, तो इन संकेतो को ध्यान रखें। जिससे आप इसकी पहचान कर जल्द ही डॉक्टर से संपर्क करें। जानिए इन संकेतों के बारे में।

किडनी की पथरी से पीठ या पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द हो सकता है, जो कुछ मिनटो या घंटो तक बना रह सकता है। इसमें दर्द के साथ जी मिचलाने तथा उल्टी की शिकायत भी हो सकती है। यदि मूत्र संबंधी प्रणाली के किसी भाग में संक्रमण है तो इसके लक्षणों में बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, पेशाब आने के साथ-साथ दर्द होना आदि भी शामिल हो सकते हैं मूत्र में रक्त भी आ सकता है।
 
जो लोग इस समस्या से ग्रसित होते है। इन लोगों को यूरीन अक्सर गुलाबी, लाल या भूरे रंग का आने लगता है। जो कि आगे चलकर स्टोन बढ़ जाता है। जिसके कारण मूत्रमार्ग ब्लॉक हो जाता है, जिसके कारण यूरिन जाते समय खून के टिग्नेस आ सकते हैं।

हमेशा फीवर बना रहना -

किडनी स्टोन होने पर अक्‍सर तेज बुखार और ठंड लगने की समस्‍या बनी रहती है। इसका कारण मूत्र पथ के संक्रमण (या यूटीआई) की संभावना बढ़ जाती है। अगर ऐसा होतो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
 
यह भी पढ़ें - अगर दिखें ये लक्षण तो समझ जाइए आप हैं हेपेटाइटिस B के शिकार, तुरंत जाकर डॉक्टर से मिलें

हो रही हो बैठने में परेशानी -

अगर आपको बैठने में परेशानी हो रही है, तो यह किडनी में स्टोन होने के कारण हो सकता  है, क्योंकि किडनी स्‍टोन के बड़े या काफी उत्तेजक होने पर उस क्षेत्र पर दबाव पड़ने के कारण होता है।

किडनी या पेट में सूजन -

अगर आपके पेट या किडनी में सूजन रहती है, तो यह स्टोन के कारण हो सकती है।

यूरीन करते समय दर्द होना -

अगर आपको यूरिन करते समय तेज दर्द हो, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। यह किडनी में स्‍टोन होने का एक लक्षण है। ऐसा तब होता है जब किडनी स्‍टोन मूत्रमार्ग से मूत्राशय में चले जाते है। ये बेहद दर्दनाक होता है और यह अक्सर मूत्र पथ के संक्रमण (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफैक्शन) का कारण भी बनता है।
अगक आपके पीठ में अक्सर दर्द बना रहता है। यानी कि निचले हिस्से में इसके साथ ही जांध के बीच वाले भाग में दर्द रहता है। जिसमें थोड़ा आराम मिलने के बाद फिर दर्द होने लगता है, तो यह किडनी में स्टोन होने का एक कारण है।

उल्टी -

अगर आपको हमेशा पेट में गड़बड़ी, उल्टी या मिचली आती है, तो स्टोन होने का संकेत हो सकता है। उल्टियां दो कारण के कारण आ सकती है। पहला स्टोन के स्थानांतरण के कारण तथा दूसरा किडनी शरीर के भीतर की गंदगी यानी कि टॉक्सिक को बाहर करने में मदद करते हैं और जब स्टोन के कारण अवरुद्ध हो जाते हैं तो इन टॉक्सिकों को शरीर से बाहर निकालने के लिए उल्टी ही एकमात्र रास्ता बचता है।
 
अगर आपके किडनी में स्टोन है, तो यूरिन का रंग बदलने के साथ-साथ उससे बदबू भी आती है। इसका कारण शरीर में मौजूद हाई केमिकल्स है। जो कि स्टोन बनाने का कारण बनते है।
 
डिसक्लेमर : दोस्तों, आयुर्वेदप्लस में दी गई जानकारी पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए है। अतः हम आप से निवेदन करते हैं की किसी भी उपाय का प्रयोग करने से पहले अपने चिकित्सक से सलह लें। हमारा उद्देश्य आपको जागरूक करना है। आपका डाॅक्टर ही आपकी सेहत बेहतर जानता है इसलिए उसका कोई विकल्प नहीं है।   

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

किस उम्र में कौन सी जांच कराना है ज़रूरी? जानने के लिए पढ़िए!

किस उम्र में कौन सी जांच कराना है ज़रूरी? जानने के लिए पढ़िए!


यहाँ आपको उम्र के हिसाब से ज़रूरी शारीरिक जांच के बारे में बताया गया है. बढती उम्र के साथ साथ हमारे शरीर की क्षमता घटती जाती है. जितनी आसानी से हम बचपन या जवानी में बीमारियों से लड़ सकते हैं, बाद में यह मुमकिन नहीं. ऐसा होना प्राकृतिक भी है. जैसे जैसे उम्र बढती जाती है हमारा शरीर कमजोर होता जाता है. यह स्वाभाविक है.

हम अच्छा संतुलित आहार लेकर, व्यायाम कर के, योग इत्यादि अपना कर शरीर की घटती क्षमता की रफ़्तार तो कम कर सकते हैं, लेकिन इसे रोक या छुटकारा नहीं पा सकते. ऐसा होना तय है. दूसरा, इसके अलावा अनुवांशिक यानि जेनेटिक और अन्य कारणों से भी शरीर में बीमारियों का खतरा बना रहता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन से हार मान ली जाये. बल्कि ज़रूरी है कि समय समय पर इनका ध्यान रखा जाये ताकि ज़रूरी एहतियात बरती जा सके और समय रहते बीमारी को काबू किया जा सके.

इन जांचों (Check Ups) की कीजिये शुरुआत :

आइये जानते हैं उम्र के हिसाब से हमें कौन कौन से टेस्ट या जांच सावधानी के तौर पर करा लेनी चाहिए :
20 की उम्र से :
20 की उम्र में हम जवानी में पहले कदम रख रहे होते हैं. हमें शरीर में बढती ताकत महसूस होने लगती है. यह विकास का समय होता है. लेकिन कुछ बीमारिया ऐसी हैं जो इसी समय में शरीर में पैठ बना लेती हैं. इसलिए 20 की उम्र से ये जांच ज़रूर करवाएं :
  • हर साल ब्लड प्रेशर, हाईट और वजन की जांच.
  • सालाना आँखों कि और दांतों कि जांच.
  • हर दुसरे साल एसिडिटी और एचआईवी (HIV) की जांच.
  • हर पांचवे साल कोलेस्ट्रोल कि जांच.
30 की उम्र से :
30 तक आते आते हम शरीर में बदलाव महसूस करने लगते हैं. जवानी के चरम पर इस अवस्था में सब कुछ मुमकिन लगता है. यह संघर्ष, क्षमता और सपनों को पूरा कर लेने का समय होता है. लेकिन ऐसे में भी ये जांच करवा लेना ठीक है :
  • ऊपर की सभी जांच.
  • डायबिटीज, थाइरोइड, एनीमिया और लीवर की समस्या के लिए खून की जांच.
  • साल में एक बार कोरोनरी हार्ट डिजीज के लिए जांच.
40 की उम्र से :
40 की उम्र में पता चलता है कि आप दिल से भले ही 25 हों पर आपके शरीर में अब वो पहले जैसी बात नहीं रही. ध्यान रखें कि आप ये जांच करवा लें :
  • ऊपर बताई सभी जांच.
  • हर पांच साल में कर्दिओवस्कुलर इवैल्यूएशन.
  • सालाना प्रोस्टेट कैंसर के लिए जांच.
50 की उम्र से :
50 पार करने के बाद आप चाहे मानें या न मानें, लेकिन आप एक कदम तो ज़रूर बुढ़ापे में रख चुके हो. इसलिए बीमारियों का थोडा ज्यादा ध्यान रखें तो और बेहतर होगा. ये जांच करा लेनी चाहिए :
  • ऊपर बताई गयी सभी जांच.
  • सालाना टाइप 2 डायबिटीज कि जांच.
  • हर साल आँख और कान की जांच.
  • सालाना डिप्रेशन की जांच.
  • एक बार साल में लिपिड (वसा) डिसऑर्डर की जांच.
60 की उम्र से :
मुबारक हो! 60 पार करने की ख़ुशी में सरकार ने भी आपको आराम, मौज और अपना ध्यान रखने के लिए रिटायर कर दिया है! इस पड़ाव पर ध्यान रखें की बचाव ही इलाज है. ये जांच करवा लेनी चाहिए :
  • ऊपर बताई गयी सभी जांच.
  • ऑस्टियोपोरोसिस के लिए हर साल स्क्रीनिंग.
  • डिमेंशिया और अल्जाइमर के लिए हर साल जांच.

बुधवार, 7 मार्च 2018

...तो इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं इरफ़ान खान !

...तो इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं इरफ़ान खान !


बॉलीवुड एक्टर इरफान खान को ब्रेन ट्यूमर के चलते कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से एक पोस्ट कर बताया था कि वो किसी गंभीर बीमारी से जूंझ रहे हैं। लेकिन अब सामने आ गया है कि वे ब्रेन ट्यूमर जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं।

इरफान खान ब्रेन ट्यूमर की चौथी स्टेज पर है, जहां यह बीमारी और भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसके अलावा खबर यह भी है कि जल्द ही उनका ऑपरेशन किया जा सकता है। इरफान खान ने खुद सोमवार को एक ट्वीट करते हुए लिखा था कि पिछले 15 दिनों से उनकी जिंदगी खतरे में चल रही है। 

आइये जानते हैं की आखिर ब्रेन कैंसर क्या है?
ब्रेन कैंसर, कैंसर का वह रूप है जो मस्तिष्क (ब्रेन) से शुरू होता है। ब्रेन कैंसर मस्तिष्क की एक प्रकार की बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क के ऊतकों में कैंसर कोशिकाएं (घातक कोशिकाएं) पैदा होने लगती हैं। कैंसर की कोशिकाएं मस्तिष्क में ऊतकों के समूह या एक ट्यूमर के रूप में ऊभरती हैं, जो मस्तिष्क के कार्यों में बाधा उत्पन्न करती हैं। जैसे मांसपेशियों के नियंत्रण में परेशानी, सनसनी, यादाश्त और अन्य मस्तिष्क कार्यों को प्रभावित करना।

कैंसर जो मस्तिष्क में शुरू होता है उसको प्राइमरी ब्रेन ट्यूमर कहा जाता है। यह ट्यूमर मस्तिष्क की संरचना से जुड़े किसी भी भाग में विकसित हो सकता है। जो कैंसर शरीर के किसी अन्य भाग से मस्तिष्क में फैलता है, उसे सेकंडरी ब्रेन ट्यूमर या ब्रेन मेटास्टेस (Metastases) कहा जाता है। ब्रेन कैंसर ट्यूमर मस्तिष्क पर अधिक दबाव डालता है, जिससे या तो वह ऊतक नष्ट होने लग जाते हैं या शरीर के अन्य भागों में समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।

ब्रेन कैंसर के लक्षण व संकेत क्या होते हैं?
मेटास्टेटिक ब्रेन ट्यूमर के संकेत और लक्षण काफी सूक्ष्म हो सकते हैं, जिनका पता लगाने (खासकर पहली बार) में परेशानी हो सकती है। ये ट्यूमर अक्सर किसी दूसरी स्थिति की जांच के दौरान दिखाई देते हैं। इसके लक्षण विकसित होने का कारण यह होता है कि ब्रेन का ट्यूमर या तो मस्तिष्क पर दबाव डाल रहा होता है या फिर उसके किसी हिस्से को ठीक से काम करने से रोक रहा होता है।

इस दौरान मरीज क्या अनुभव कर रहा हैं? आम तौर पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि ट्यूमर कहां पर है और आकार में कितना बड़ा है।

संभावित लक्षण जिनमें शामिल हैं:
कभी-कभी मतली और उल्टी के साथ सिर दर्द - यह समस्या ट्यमर के कारण होती है जो आस-पास के ऊतकों को दबाकर खोपड़ी में दबाव बनाता है। आम तौर पर स्थिति सुबह के समय बद्तर होती है और दिन निकलने के साथ-साथ कम होती जाती है।

पूरे शरीर में या आंशिक रूप से दौरे पड़ना, मांसपेशियों में ऐंठन, असामान्य गंध या स्वाद, बोलने में समस्या या सुन्नता और झुनझुनी अनुभव करना।
बोलने, समझने और देखते में समस्या- ब्रेन में ट्यूमर मस्तिष्क के उस भाग को प्रभावित कर सकता है, जो इन क्षमताओं को नियंत्रित करते हैं।

शारीरिक कमजोरी और सुन्नता, यह तब होती है जब ट्यूमर मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करता है जो मांसपेशियों को नियंत्रित करते है। यदि ट्यूमर मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले सामान्य संकेतों के रास्ते में विकसित हो जाता है तो यह ब्रेन की कार्यगति (Brain motor fuctions) में परेशानी पैदा करता है।

ब्रेन कैंसर के साथ जुड़े अन्य लक्षण:
  • दौरे पड़ना,
  • संवेदी (स्पर्श) और ब्रेन की कार्यगति (मूवमेंट कंट्रोल) में कमी,
  • बहरापन,
  • उनींदापन या उंघना,
  • थकान,
  • समन्वय में कमी,
  • चेहरे पर कमजोरी का भाव,
  • दोहरा दिखाई देना,
  • डिप्रेशन (अवसाद),
व्यवहारिक और सोचने समझने की क्षमता में परिवर्तन।
उपरोक्त लक्षण ट्यूमर के प्रकार, आकार और उसकी जगह से जुड़े हो सकते हैं। इसके साथ ही साथ ये ब्रेन कैंसर को नियंत्रित करने के लिए उपचार में भी मदद करते हैं। सर्जरी, विकिरण (रेडिएशन), कीमोथेरेपी, और अन्य सभी प्रकार के उपचारों में नए लक्षण उत्पन्न करने की क्षमता होती है, क्योंकि ये ट्यूमर के प्रभाव को कम करने के लिए काम करते हैं।

ब्रेन कैंसर क्यों होता है?
यह निश्चित रूप से पता नही लगाया जा सका है कि अधिकतर ब्रेन कैंसर का क्या कारण है। लेकिन, कुछ ऐसे कारक हैं जो ब्रेन कैंसर के विकसित होने के जोखिम को बढ़ा देते हैं। विभिन्न प्रकार के कैंसर के विभिन्न जोखिम कारक हो सकते हैं:

लंबे समय तक किसी केमिकल या रेडिएशन के संपर्क में रहना ब्रेन कैंसर के विकसित होने का एक जोखिम कारक है। आम तौर पर लोग अपने कार्यस्थल आदि पर ऐसी चीजों के संपर्क में आते हैं। यह उन लोगों में अधिक आम होता है, जिन्होनें पहले कभी रेडियोथेरेपी, सीटी स्कैन या सिर का एक्स-रे आदि करवाया होता है। इनमें भी खासकर उनका, जिनका बचपन में कैंसर के लिए स्कैन या उपचार किया गया हो।

जिन लोगों को बचपन में कैंसर हुआ हो, उनमें बाद की जिंदगी में ब्रेन कैंसर विकसित होने के उच्च जोखिम होते हैं। जिन लोगों को वयस्क होने के बाद कभी ल्यूकेमिया हुआ हो, उनके लिए भी ब्रेन कैंसर के जोखिम बढ़ जाते हैं।
आनुवंशिक रूप से विरासत में मिली बीमारियां भी किसी व्यक्ति को ब्रेन ट्यूमर के लिए अतिसंवेदनशील बना सकती हैं। अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता या भाई-बहन में से किसी को ब्रेन ट्यूमर है या था, तो उसके लिए सामान्य लोगों के मुकाबले जोखिम ज्यादा हो सकते हैं।

ब्रेन कैंसर किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ, ब्रेन कैंसर होने के जोखिम भी बढ़ते जाते हैं। लेकिन ब्रेन ट्यूमर के कुछ ऐसे प्रकार भी हैं, जो कम उम्र के लोगों के लिए ज्यादा आम होते हैं।
एचआईवी एड्स के से ग्रसित लोगों में आम लोगों की तुलना में ब्रेन ट्यूमर मिलने के अधिक जोखिम होते हैं। यह रोगप्रतिरोग क्षमता में कमजोरी से भी जुड़ा हो सकता है। (और पढ़ें - एचआईवी एड्स के लक्षण)

उपरोक्त जोखिम कारक होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि इससे निश्चित रूप से ब्रेन कैंसर विकसित हो सकता है।

ब्रेन कैंसर की रोकथाम कैसे की जा सकती है?
ब्रेन कैंसर को रोकने का कोई तरीका नहीं है, हालांकि मस्तिष्क में फैलने वाले ट्यूमर का जल्दी निदान और उपचार मस्तिष्क में ट्यूमर विकसित होने के जोखिम को कम कर सकता है।
प्राइमरी ब्रेन कैंसर के जोखिम बनने वाले कुछ संभावित कारक जैसे सिर में विकिरण थेरेपी, एचआईवी संक्रमण और वातारण के विषाक्त पदार्थ भी हो सकते हैं। इसलिए इनके संपर्क में आने से बचने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव करने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, ब्रेन कैंसर के विकसित होने के विशेष कारणों के बारे में कोई नहीं जानता, खासकर प्राइमरी ब्रेन कैंसर के कारण को। इसलिए इसकी रोकथाम करने के किसी विशेष तरीके की जानकारी नहीं है।

ब्रेन कैंसर का परीक्षण कैसे किया जा सकता है?
अगर आपको ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, जो ब्रेन कैंसर का संदेह उत्पन्न करते है तो ऐसे में डॉक्टर आपका शारीरिक परीक्षण करेंगे और आपकी तथा आपके परिवार की पिछली स्वास्थ्य और मेडिकल स्थिति के बारे में पूछेंगे।

इसके तहत निम्नलिखित टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है:
 
न्यूरोलॉजिक (तंत्रिका संबंधी) परीक्षण – 
डॉक्टर आपके देखने व सुनने की शक्ति, मांसपेशियों में शक्ति, समन्वय और सजगता आदि की जांच करेंगे। डॉक्टर आंखों में सूजन की भी जांच करेंगे, जो मस्तिष्क में दबाव बढ़ने के कारण मस्तिष्क से आंखों को जोड़ने वाली नसों में दबाव आने के कारण आती है।

एमआरआई (MRI) – 
मस्तिष्क के ऊतकों में आए बदलावों के देखने के लिए एमआरआई से तस्वीरें ली जाती है। इसकी तस्वीरों में असामान्य जगहों को पहचाना जाता है, जैसे कि कोई ट्यूमर।

सीटी स्कैन (CT scan) – 
इसके इस्तेमाल भी मस्तिष्क में ट्यूमर जैसे असामान्य क्षेत्रों को देखने के लिए किया जाता है। (और पढ़ें - सीटी स्कैन क्या है)

एंजियोग्राम (Angiogram) – 
अगर मस्तिष्क में कैंसर है, तो उसे एंजियोग्राम की मदद से देखा जा सकता है।

बायोप्सी (Biopsy) – 
इसमें ट्यूमर की कोशिकाओ को देखने के लिए ऊतक का नमूना निकाला जाता है। बायोप्सी की मदद से ऊतकों के बदलाव जो कैंसर का कारण बन सकते हैं उनका एवं अन्य स्थितियों के बारे में पता लगाया जाता है। एक बायोप्सी मस्तिष्क कैंसर का निदान करने और उपचार की योजना तैयार करने का एकमात्र निश्चित तरीका है।

ब्रेन कैंसर का उपचार कैसे किया जाता है?
ब्रेन कैंसर का उपचार आम तौर पर कैंसर के प्रकार, आकार और स्थान पर निर्भर करता है। इसके साथ ही साथ आपके समग्र स्वास्थ्य और आपकी प्राथमिकताएं भी महत्वपू्र्ण भूमिका निभाती हैं।


1. सर्जरी (Surgery)-
अगर मस्तिष्क में ट्यूमर ऐसी जगह पर स्थित है, जहां पर ऑपरेश्न की मदद से पहुंचा जा सकता है, तो डॉक्टर ट्यूमर को जितना हो सके बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।
कुछ मामलों में ट्यूमर, छोटा और मस्तिष्क से आसानी से निकल जाने की दशा में होता है, जिससे सर्जरी के माध्यम से हटाना संभव होता है। वहीं, कुछ मामलों में ट्यूमर ऐसी दशा में होता है जिसको मस्तिष्क से अलग नहीं किया जा सकता या वह किसी संवेदनशील जगह के आस पास होता है, जिससे सर्जरी जोखिम भरी बन जाती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर उतना ही ट्यूमर हटाने की कोशिश करते हैं, जितना संभव हो पाता है।
ब्रेन कैंसर ट्यूमर से कुछ हिस्से को हटाने से भी ब्रेन कैंसर से संकेत व लक्षण कम हो जाते हैं।
सर्जरी द्वारा ब्रेन ट्यूमर को निकालने के साथ संक्रमण और खून बहने जैसे जोखिम होते हैं। अन्य लक्षण उस जगह पर निर्भर करते हैं, जहां पर ब्रेन ट्यूमर विकसित हुआ है। सर्जरी को चुनने से पहले उसके सभी जोखिमों के समझने के लिए डॉक्टर से बात करें।

2. रेडिएशन थेरेपी (Radiation therapy)
रेडिएशन थेरेपी में ट्यूमर ग्रसित कोशिकाओं को मारने के लिए एक्स-रे या प्रोटोन्स जैसी उच्च उर्जा की किरणों का इस्तेमाल किया जाता है। विकिरण चिकित्सा आपके शरीर के बाहर एक मशीन से आ सकती है, जिसे एक्सटर्नल बीम रेडिएशन कहा जाता है। बहुत ही कम मामलों में मशीन को शरीर के अंदर और मस्तिष्क के पास लगाया जाता है, जिसे ब्रैकीथेरेपी (Brachytherapy) कहा जाता है।
एक्सटर्नल बीम रेडिएशन सिर्फ उस जगह पर फोकस करती है, जहां पर ट्यूमर होता है। कई बार इसका फोकस पूरे मस्तिष्क पर लगा दिया जाता है, इसे पूर्ण मस्तिष्क पर विकिरण (Whole-brain radiation) कहा जाता है, इसका प्रयोग खासकर उस प्रकार के कैंसरों के इलाज के लिए किया जाता है जो शरीर के किसी अन्य हिस्से से मस्तिष्क में फैल जाते हैं।

3. कीमोथेरेपी (Chemotherapy) - 
कीमोथेरेपी में ट्यूमर ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए दवाओं का उपयोग किया जाता है। कीमोथेरेपी की दवा, खाने के लिए टेबलेट और नसों में इंजेक्शन के रूप में दी जाती है। कीमोथेरेपी की कई प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं, जिनका इस्तेमाल कैंसर के प्रकार के अनुसार किया जाता है।
कीमोथेरेपी की दवाओं के साइड इफेक्ट उसकी खुराक पर निर्भर करते हैं, इसके कारण बाल झड़ना, मतली और उल्टी जैसे समस्याएं हो सकती हैं।

4. टारगेटेड दवा थेरेपी (Targeted drug therapy)
लक्षित या टारगेटेड दवाओं द्वारा उपचार का मुख्य लक्ष्य उन विशेष असामान्यताओं पर होता है जो ब्रेन कैंसर के दौरान दिखाई देती हैं। इन असामान्यताओं को रोककर, कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।
इन दवाओं को नसों में इंजेक्शन के द्वारा लगाया जाता है, जिससे नई रक्त वाहिकाओं को बनने से रोका जाता है, ब्रेन कैंसर की कोशिकाओं में खून की सप्लाई को बंद कर दिया जाता है और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।

5. पैलीएटिव केयर (प्रशामक चिकित्सा; Palliative care)-
इस उपचार में मुख्य रूप से रोग के लक्षणों को कम करने, जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और रोगी तथा उसके परिवार वालों को सहारा देने पर ध्यान दिया जाता है। दर्दनिवारक उपचार व्यापक रूप से काफी भिन्न होते हैं, इनके साथ अक्सर दवाएं, पोषक तत्वों में बदलाव, आराम करने की तकनीक, भावनात्मक सहायता और अन्य प्रकार की थेरेपी शामिल होती हैं।

कोई भी व्यक्ति, अपनी उम्र, कैंसर के प्रकार या स्टेज की परवाह किए बिना दर्दनिवारक उपचार ले सकता है। यह और भी बेहतर काम करता है, जब यह उतना ही जल्दी शुरू की जाए जितना जल्दी उपचार की प्रक्रिया आवश्यक होती है। लोग एक ही समय में ट्यूमर के इलाज की दवाएं और साइड इफेक्ट को कम करने की दवाएं एक साथ ले सकते हैं। बल्कि, जो मरीज इन दोनों प्रकार की दवाओं को एक साथ लेते हैं, उनके लक्षण कम गंभीर होते हैं। जो मरीज इसप्रकार से अपना इलाज पाते हैं वे जीवन की बेहतर गुणवत्ता एवं उपचार संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

6. उपचार के बाद पुनर्वास​ (Rehabilitation after treatment)
क्योंकि ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क के उन हिस्सों में विकसित हो सकता है जो मस्तिष्क की कार्यशीलता (मोटर स्किल्स), दृष्टि, बोलने और सोचने-समझने जैसे कार्यों को नियंत्रित करती है, इसलिए उपचार के बाद पुनर्वास की सुविधा स्वस्थ होने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। आपके डॉक्टर आपको उन सेवा प्रदाताओं के पास भेज सकते हैं, जो आपकी मदद कर सकती हैं, जैसे:

शारीरिक थेरेपी (Physical therapy) –
यह  मष्तिष्क के क्रियाशील रूप (मोटर स्किल्स )में आई हुई कमी या मांसपेशियों की ताकत को फिर से हासिल करने में मदद कर सकती है।
स्पीच थेरेपी (Speech therapy) –
यह विशेष रूप से ठीक बोलने में परेशानी महसूस करने वाले मरीजों की दी जाती है, जो मरीज को पहले की तरह बोलने की आदत व क्षमता को फिर से वापस पाने में मददगार होती हैं।

रविवार, 4 मार्च 2018

क्या आप भी टूथपेस्ट करने से पहले ब्रश को गीला करते हैं, तो शायद आप अभी तक इस बात से अनजान हैं

क्या आप भी टूथपेस्ट करने से पहले ब्रश को गीला करते हैं, तो शायद आप अभी तक इस बात से अनजान हैं




क्या आप भी ब्रश करने से पहले अपने अपने टूथब्रश को गीला करते हैं, या फिर टूथपेस्ट लगाने के बाद ब्रश को गीला करते हैं. हो सकता है कि आप इनमें से कोई भी तरकीब न अपनाते हों और आपका अपना कुछ अलग स्टाइल हो, क्यों सही है न?

पढ़ने में भले ही आपको ये बातें थोड़ी सी अजीब लग रही हों, लेकिन सोशल मीडिया पर इसी चीज़ को लेकर जंग छिड़ी हुई है. एक तरफ़ ऐसे लोग हैं, जो कह रहे हैं कि ब्रश को पानी से गीला करने के बाद उस पर टूथपेस्ट लगाना चाहिए, तो वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जिनका कहना है कि ब्रश पर टूथपेस्ट लगाने के बाद उस पर पानी डालना चाहिए.

क्या आप भी ब्रश करने से पहले अपने अपने टूथब्रश को गीला करते हैं, या फिर टूथपेस्ट लगाने के बाद ब्रश को गीला करते हैं. हो सकता है कि आप इनमें से कोई भी तरकीब न अपनाते हों और आपका अपना कुछ अलग स्टाइल हो, क्यों सही है न?

पढ़ने में भले ही आपको ये बातें थोड़ी सी अजीब लग रही हों, लेकिन सोशल मीडिया पर इसी चीज़ को लेकर जंग छिड़ी हुई है. एक तरफ़ ऐसे लोग हैं, जो कह रहे हैं कि ब्रश को पानी से गीला करने के बाद उस पर टूथपेस्ट लगाना चाहिए, तो वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जिनका कहना है कि ब्रश पर टूथपेस्ट लगाने के बाद उस पर पानी डालना चाहिए.

ख़ैर, जैसा कि सभी जानते हैं कि बहस का कोई अंत नहीं होता. इसलिए इस मुद्दे पर डॉक्टर्स की सलाह लेना सही समझा गया. डेनटिस्ट Luke Thorley ने बताया, टूथब्रश को गीला नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से आपके टूथपेस्ट का प्रभाव कम हो जाता है.

वहीं Dr. Raha का भी कुछ यही मानना है कि अगर आपको ब्रश करने से पहले आपको उसे गीला करना पसंद है, तो आप उसे हल्का सा वेट कर सकते हैं क्योंकि ज़्यादा पतले टूथपेस्ट से ब्रशिंग की दक्षता कम हो जाती है, जो कि आपके दांतो के लिए काफ़ी नुकसानदायक है. यही वजह है कि ब्रश करने के बाद पानी लेकर अच्छे से कुल्ला करना चाहिए, ताकि टूथपेस्ट के अवशेष आपके दांतों के अंदर न रह जाएं.

रविवार, 28 जनवरी 2018

इस पूर्णिमा पर लगने वाला है ये दुर्लभ चन्द्रग्रहण, गलती से भी ना करें ये काम

इस पूर्णिमा पर लगने वाला है ये दुर्लभ चन्द्रग्रहण, गलती से भी ना करें ये काम

 

जिस रात पूरा चंद्रमा नजर आता है उस रात को हम पूर्णिमा की रत कहते हैं लेकिन यदि इस चाँद पर ग्रहण लग जाये तब हम इसे चन्द्र ग्रहण कहते हैं और इस वर्ष यानि की 2018 में  31 जनवरी को पूर्णिमा है और इस दिन वर्ष का पहला चन्द्रग्रहण भी लग रहा है। ज्योतिष के अनुसार ये  दुर्लभ चन्द्रग्रहण है क्योंकि ये पूर्णिमा के दिन लगने वाला है ग्रहण है और हमारे पंचांग में लिखा है कि 31 जनवरी को सुबह 7 बजकर 7 मिनट 21 सेकेंड से सूतक काल शुरु हो जाएगा जो रात 8 बजकर 41 मिनट और 10 सेकेंड तक रहेगा। पूर्ण चन्द्रग्रहण का समय शाम 5 बजकर 58 से रात 8 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।

शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है की चन्द्र ग्रहण की रात चन्द्र देवता तकलीफ में होते हैं इसीलिए शास्त्रों में कुछ ऐसे काम का वर्णन किया गया है जिसे हमे चंद्रग्रहण की रात भूल से भी नहीं करना चाहिए अन्यथा हमारे जीवन में कई मुसीबते आ जाती हैं इसीलिए आज हम आपको बताएँगे की बुधवार को लगने वाले इस ग्रहण के दिन आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए जो की आपके लिए जानना अति आवश्यक है।

चन्द्रग्रहण लगने पर कौन से काम करने चाहिए

जिस दिन ग्रहण लगे उस दिन यदि आप किसी पवित्र नदी में स्नान करते हैं तो इससे आपको बहुत  पुण्य मिलता है और पिछले किये गये पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन किसी गरीब और जरुरतमंद को दान करने से आपको जीवन में सफलता मिलती है जीवन में खुशियां आती हैं। शास्त्रों में लिखा है कि इस दिन मंत्रों का जाप करने से विशेष लाभ भी मिलता है इसीलिए ग्रहण के समय आप इन मन्त्रों का जाप करें।

तमोमय महाभीम सोमसूर्यविमर्दन।
हेमताराप्रदानेन मम शान्तिप्रदो भव॥१॥

इस श्लोक का अर्थ है- अन्धकाररूप महाभीम चन्द्र-सूर्य का मर्दन करने वाले राहु, सुवर्णतारा दान से मुझे शान्ति प्रदान करें।

विधुन्तुद नमस्तुभ्यं सिंहिकानन्दनाच्युत।
दानेनानेन नागस्य रक्ष मां वेधजाद्भयात्॥२॥

इस श्लोक का अर्थ है- सिंहिकानन्दन (पुत्र), अच्युत! हे विधुन्तुद, नाग के इस दान से ग्रहणजनित भय से मेरी रक्षा करो।

चन्द्रग्रहण लगने पर कौन से कम वर्जित हैं

चन्द्रग्रहण के दिन जब से सूतक काल शुरु हो जाए और जितनी भी समय तक रहे उस दौरान भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए इसके अलावा मंदिर का द्वार बंद रखना चाहिए और मुर्तियों को छूना भी नहीं चाहिए। जो भी खाना बना हो उस खाने में खाना तुलसी के पत्ते डाल देने चाहिए और ध्यान रहे की सूतक के समय कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए तथा सूतक के समय बाल या नाखुन नहीं काटने चाहिए।

हिन्दू पंचांग के अनुसार गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के समय बाहर नहीं जाना चाहिए क्योंकि उसमे लिखा है की सूतक के समय राहु और केतु की दृष्टि इस काल में वक्री होती है जो गर्भवती महिलाओं के लिए काफी हद तक नुकसानदायक होती है और इस काल में बाहर निकलने से जन्म लेने वाला बच्चा गिरने का डर, बच्चे के अपंग होने के और इस तरह के कई परेशानिया की शंका बनी रहती है और सूतक वाले दिन गर्भवती महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई भी नहीं करनी चाहिए।

चंद्रग्रहण के समय शरीर पर तेल ना लगाए और इसके अलावा  मल-मूत्र का विसर्जन ना करें, कोशिश करें की पानी ना पीएं, या कम पिए , बालो को  ना बांधे, दांत की  सफाई  ना करें और शारीरिक संबंध भी ना बनाएं।

बुधवार, 10 जनवरी 2018

घरेलु उपचार करने से पहले जान लीजिये ये बातें वरना होगा नुकसान !

घरेलु उपचार करने से पहले जान लीजिये ये बातें वरना होगा नुकसान !


दोस्तों,
बहुत से लोग बिना कुछ सोचे समझे या किसी ने कुछ घरेलु उपाय बता दिया तो बिना किसी जानकारी के उस उपाय को करने लग जाते है और बाद में उसका नुक्सान उन्हें उठाना पड़ता है !

आज हम आपको इस विडियो के माध्यम से बता रहे है की किस घरेलु उपाय को करने से पहले क्या सावधानी बरतनी चाहिए !

विडियो देखिये :

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

भूल कर भी ना शेयर करें अपनी इयरफ़ोन, वजह जान कर चौंक जाओगे…

भूल कर भी ना शेयर करें अपनी इयरफ़ोन, वजह जान कर चौंक जाओगे…


आजकल अपने देखा ही होगा गाने और बातें सभी इयरफ़ोन के माध्यम से करते है. इयरफ़ोन के बिना तो सफ़र में मजा भी नही आत. इयरफ़ोन लगा डालो और भूल जाओ सारे गम. कई बार हम यारी दोस्ती में इयर फ़ोन शेयरिंग करते हैं. लेकिन हम इससे होने वाले नुकसान को ध्यान में नहीं रख पाते हैं. आए दिन इस पर रिसर्च भी होते रहते हैं. सबमें इससे होने वाले नुकसान को अलग-अलग तरीके से बताया जाता है. आप इयरफ़ोन दूसरों के साथ शेयर करते हैं तो ये 5 बातें आपके लिए ही हैं.


कई बार हम यारी दोस्ती में इयर फ़ोन शेयरिंग करते हैं. लेकिन हम इससे होने वाले नुकसान को ध्यान में नहीं रख पाते हैं. आए दिन इस पर रिसर्च भी होते रहते हैं. सबमें इससे होने वाले नुकसान को अलग-अलग तरीके से बताया जाता है. आप इयरफ़ोन दूसरों के साथ शेयर करते हैं तो ये 5 बातें आपके लिए ही हैं.

अगर आप भी शेयर करते है इयरफ़ोन तो पहले जान लें ये बातें-

इयरफ़ोन से फंगल इन्फेक्शन का डर……
एक स्टडी के मुताबिक कान दर्द से पीड़ित करीब 7 फीसदी लोग कान में फंगल इन्फेक्शन या फफूंदी की समस्या से परेशान रहते हैं. लिहाजा अगर आप किसी इन्फेक्टेड व्यक्ति के इयरफोन का इस्तेमाल करते हैं तो यह फंगस आपके कान तक भी पहुंच सकता है.
इयरफ़ोन ये भी हो सकता है जानें……
मान लीजिए आपका दोस्त अपने फेवरिट कुत्ते के साथ सोता है. अगर आपके दोस्त के कुत्ते के कान में घुन है जो निकलकर आपके दोस्त के इयरफोन में घुस गया और अब जब आप अपने दोस्त के उस इयरफोन का इस्तेमाल करेंगे तो वह घुन आपके कान तक पहुंच जाएगा.


इयरफ़ोन संक्रमण का खतरा….
अगर किसी व्यक्ति को इन्फ्लुएन्जा है तो इसकी पूरी संभावना है कि उस व्यक्ति के कान में भी संक्रमण हो जाएगा. ऐसे में अगर इन्फ्लुएन्जा से पीड़ित कोई व्यक्ति आपका इयरफोन इस्तेमाल करता है तो इन्फ्लुएन्जा का संक्रमण आप तक भी पहुंच सकता है.

इयरफ़ोन जर्म्स भी फैलने का खतरा……
सोचिए, क्या आप अपना टूथब्रश किसी के साथ शेयर करेंगे, किसी का पहना हुआ पसीने से भरा मोजा शेयर करेंगे. जाहिर है आपका जवाब ना होगा. इन चीजों को दूसरे के साथ शेयर करने से जर्म्स फैलते हैं. तो यही फॉर्म्युला इयरफोन पर भी लागू होता है.

कीड़ों का घोसला, जानें……
अक्सर जब हम किसी काम पर ध्यान लगाने की कोशिश करते हैं तो कुछ कीड़े या भुनगे हमारा ध्यान भटकाते हैं. ये कीड़े अंडे देते हैं और जब उन्हें गर्म और नमी वाला वातावरण मिलता है तो ये अंडे कीड़े में बदल जाते हैं. अगर आपने अपना इयरफोन कहीं छोड़ दिया है और कोई कीड़ा उसके अंदर अपना अंडा दे देता है तो इयरफोन के अंदर भुनगा बन जाएगा. उस इयरफोन का इस्तेमाल करने पर वह आपके साथ ही आपके उस फ्रेंड को भी परेशान कर सकता है.

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

जानिए ये हैं ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण, समय पर जांच बचाएगी आपकी जान

जानिए ये हैं ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण, समय पर जांच बचाएगी आपकी जान


कैंसर एक जानलेवा बीमारी है। साल दर साल इसके मरीज तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। ICMR के आंकड़ों के अनुसार देश में 2020 तक कैंसर के 17.3 लाख नए मामले सामने आने की आशंका है। इनमें भी स्तन,फेफड़े और सर्विक्स कैंसर के मामले टॉप पर रहेंगे।


रिपोर्ट के अनुसार 2016 में सबसे ज्यादा मरीज स्तन कैंसर के थे। इनकी संख्या तकरीबन 1.5 लाख थी। कैंसर के बारे में एक सकारात्मक तथ्य यह है कि यदि समय रहते बीमारी का पता चल जाए तो इसका उपचार भी किया जा सकता है। ऐसा ही कुछ स्तन कैंसर के साथ भी है।

हमारे सामने आम महिलाओं के अलावा कुछ सेलिब्रिटीज के उदाहरण भी सामने हैं जिन्होंने ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ जंग जीतकर एक नई जिंदगी शुरू की है। हालांकि बावजूद इसके महिलाओं में इस बीमारी को लेकर जागरूकता का स्तर बेहद कम है।

तो फिर देर किस बात की है। आइए जानते हैं पूरी बात। इसी बहाने आप लोगों की भी मदद हो जाएगी।

लक्षण 1

स्तन कैंसर का सबसे आम लक्षण स्तन पर गांठ आदि का बनना होता है। दर्दरहित, कठोर और बेढंगी सी गाठ कैंसर का संकेत होती है। कुछ मामलों में यह गांठ दर्दनाक, सॉफ्ट और गोलाकार भी हो सकती है।

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लक्षण 2

यदि स्तन पर कोई नई गांठ न हो लेकिन स्तन पर या इसके किसी हिस्से पर सूजन आ रही हो तो यह चिंता का विषय हो सकता है।

लक्षण 3

यदि त्वचा पर इर्रिटेशन हो रहा हो या स्तन पर कुछ निशान बन रहे हो तो यह भी स्तन कैंसर की निशानी हो सकती है।


लक्षण 4

यदि आपको निपल या स्तन के किसी भाग में दर्द हो रहा है तो आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसकी जांच करा लेना ही बेहतर होता है।

लक्षण 5

'निपल रिट्रैक्शन' एक स्थिति होती है, जिसमें निपल का कोना बाहर निकलने की बजाए अंदर धंस जाता है। ऐसी स्थिति में भी कैंसर की आशंका बनी रहती है।

लक्षण 6

स्तन या निपल की त्वचा लाल या मोटी हो रही हो या उसकी परत निकल रही हो तो इस पर नजर रखें। साथ ही समस्या बनी रहने पर डॉक्टर से संपर्क करें।

लक्षण 7

स्तन से दूध का निकलना तो आम बात है। मगर निपल से किसी और तरह का भी डिस्चार्ज हो रहा है तो इसे गंभीरता से लें।
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लक्षण 8 

स्तन कैंसर के मामले में गांठ या उभार हमेशा स्तन पर ही नहीं होता है। कभी-कभी स्तन से पहले गठान बांहों के नीचे या कॉलर बोन के आस-पास भी हो सकती है। 

लक्षण 9

स्तन कैंसर के कुछ मामलों में स्तन पर एग्जिमा की तरह लाल चकते भी पड़ जाते हैं। ऐसा Paget's disease नाम के रेयर कैंसर में होता है।
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जांच जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक इन लक्षणों पर तो नजर रखी ही जानी चाहिए। नियमित रूप से मैमोग्राफी और अन्य स्क्रीनिंग टेस्ट्स कराना भी बेहद आवश्यक होता है।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

कभी सोचा है ठंड के दिनों में क्यों आता है नाक से पानी?

कभी सोचा है ठंड के दिनों में क्यों आता है नाक से पानी?


सर्दियों का मौसम लगभग आ ही चुका है। अब तो सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाने में बहुत ही मज़े आते हैं। लेकिन घर से बाहर ठंडी हवा में निकलने पर अचानक ही नाक से पानी आने लगता है। वैसे आपके साथ भी ऐसा होता होगा ना? मैंने सोचा आखिर पता तो करें बिना सर्दी के सबकुछ ठीक होने पर भी नाक क्यों बहने लगती है।  फिर मुझे कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी मिली जो मैं आपसे साँझा करना चाहूंगी।


वैसे नाक और भी मौकों पर बहती है, तो आइये उन मौकों पर नाक बहने के कारण भी जान लेते हैं। 

सर्दी में क्यों बहती है नाक
अब आप सोचेंगे कि इन्फेक्शन होने पर नाक बहती है, उसे ही तो सर्दी होना कहते हैं। हाँ! आप बिलकुल सही कह रहें हैं, लेकिन उसकी कोई वजह भी तो होगी ना। असल में होता यह है कि जब आपको सर्दी होती है तो नाक में कुछ कीटाणु पैदा होते हैं।  इन कीटाणु से लड़ने और इनका खात्मा करने के लिए नाक में स्थित म्यूकस मेम्ब्रेन (श्लेष्मा झिल्ली) कुछ तरह के म्यूकस का कॉम्बिनेशन प्रोड्यूस करती है और इसी वजह से नाक बहती है। 

एलर्जी में भी बहती है नाक
अधिकतर लोगों को धूल-मिट्टी, ऊनी कपड़े, कुछ पशुओं के बाल या अन्य कई वस्तुओं के संपर्क में आते ही छींकें आने लगती हैं। इन वस्तओं को 'एलरजेन' कहते हैं, यानि वो वस्तुएं जिनसे किसी को एलर्जी हो। इस तरह की वस्तुओं के संपर्क में आने से भी ज़्यादा मात्रा में म्यूकस प्रोड्यूस होता है और नाक भी बहने लगती है। 

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रोने और नाक बहने का क्या है कनेक्शन ?
ये भी बड़ा सवाल है। हम रोते तो आँखों से हैं लेकिन साथ में नाक से भी पानी आने लगता है। इसकी वजह यह है कि जब हम बहुत ज़्यादा रोते हैं तो हमारे पलकों के आतंरिक हिस्से में स्थित डक्ट में से आंसु बहकर नाक की कैवेटिज़ में आ जाते है और यहाँ से बाहर निकलने लग जाते है।   

तीखा खाया, बह गई नाक
कभी ज़्यादा तीख़ा खा लो तो नाक, कान, आँखे सब खुल जाती हैं। आँखों में आंसू तो आते ही है, नाक से भी पानी निकलने लगता है। ऐसा होने के पीछे कारण यह है कि तीख़े फ़ूड में जो मसाले होते हैं, (ख़ासतौर पर मिर्चे) उनमें 'कैप्सेसिन' नामक एक केमिकल होता है। जो हमारे नाक के मेम्ब्रेन को मजबूर करता है कि वो ज़्यादा मात्रा में म्यूकस प्रोड्यूस करे, और फिर क्या बस नाक बहने लगती है। 


सर्द सुबह बहता है नाक से पानी

जब हम साँस लेते हैं तो हमारी नाक अंदर जाने वाली हवा को नमी प्रदान करती है, क्योंकि यह हवा हमारे फेफड़ो तक जाती है। अधिक ठंड में जब ठंडी और सुखी हवा नाक में प्रवेश करती है तो अधिक मात्रा में नमी प्रोड्यूस होती है और पानी बनकर नाक से बहने लगती है। 

एक वजह यह भी है

इसके अलावा यह भी होता है कि नाक में हमेशा पानी की कुछ बूंदे मौजूद रहती ही है। जब तापमान में बहुत ज़्यादा कमी होती है तो यह बुँदे आपस में जुड़कर बड़ी बूंदों का रूप ले लेती हैं। ये बूंदे भारी हो जाती हैं और नाक से बहने लगती है। इसकी एक और वजह यह भी है कि सर्दियों के मौसम में नाक ज़्यादा मात्रा में म्यूकस प्रोड्यूस करती है। 

इस तरह नाक बहने से नहीं होती सर्दी

कुछ लोगों को लगता है कि ठंड में ज़्यादा बाहर रहने से सर्दी हो जाती है लेकिन यह एक गलतफहमी है। ठंड के मौसम में सर्दी ज़्यादा होने का कारण ज़्यादा समय तक घर के अंदर रहना होता है। जी हाँ! यह इसलिए कि आप घर में उन लोगों के आसपास रहते है जिन्हें पहले से ही सर्दी हुई होती है। उन लोगों की छींक और कई जगहों पर कीटाणु छोड़ देती है। जिसकी वजह से आपको भी सर्दी-जुकाम हो जाता है। 
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इस दुविधा से बचने के लिए करें ये
इस मुश्किल से बचने का एक आसान उपाय यह है कि जब भी घर से बाहर निकले नाक को ढांककर निकलें। इससे नाक की गर्मी बनी रहेगी और नाक से पानी आने की समस्या का समाधान हो जाएगा। 

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

80% महिलाएं पहनती हैं गलत 'ब्रा', इन संकेतों को देखकर आप भी लगा सकते हैं पता

80% महिलाएं पहनती हैं गलत 'ब्रा', इन संकेतों को देखकर आप भी लगा सकते हैं पता


'ब्रा' एक ऐसा वस्त्र (अंतर्वस्त्र) है जो महिलाओं को पसंद हो या नापसंद उन्हें इसे पहनना ही पड़ता है। 'ब्रा' या बिकिनी आपकी कीमती अमानत का बहुत ही प्रेम से ध्यान रखती है। उन्हें संभालकर रखती है। कई महिलाएं तो अपना काम खत्म करके घर जाने की जल्दी में होती है, ताकि वो इन्हें उतारकर फेंक सके।


इस बात में कोई दो राय नहीं है कि महिलाएं शॉपिंग के मामले में एक्सपर्ट होती हैं। मुझे पूरा यकीन है कि आप अपनी 'ब्रा' भी सोच-समझकर, कुछ घंटे लगाकर पसंद करती होंगी। लेकिन तथ्यों की बात करें तो दुनिया की 80% महिलाएं गलत 'ब्रा' का चुनाव करती हैं और पहनती भी हैं।

यह समझना बहुत जरूरी है कि गलत 'ब्रा' का स्तनों के साथ आपके शरीर के ऊपरी भाग के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। सही 'ब्रा' का चुनाव करना बहुत जरूरी है। इसके लिए यह पता भी होना चाहिए कि गलत 'ब्रा' होती कौन सी है? आज बात उन्हीं संकेतों की जो बताते हैं कि कौन सी 'ब्रा' गलत है।

स्ट्रैप्स का गिरना
वैसे तो आप स्ट्रैप्स की साइज को एडजस्ट भी कर सकते हैं। यदि आपकी 'ब्रा' की स्ट्रैप्स बार-बार कंधे से उतर रही है तो इसे एडजस्ट कर लें। लेकिन ऐसा करने के बाद भी समस्या बनी हुई है तो आपको कम बैंड साइज की 'ब्रा' का चुनाव करना चाहिए।
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कप सिकुड़ना
छोटे स्तनों वाली महिलाओं के साथ अक्सर ही ऐसी स्थिति बनती है, लेकिन वो इसे नजरअंदाज कर देती है। यदि आपकी 'ब्रा' के कप सिकुड़ रहे हैं तो आपको छोटे कप साइज का चुनाव करना चाहिए। यह आपके ओवरऑल लुक तो बिगाड़ता है।


बैंड का ऊपर होना 
आपकी 'ब्रा' के पिछले हिस्से की बात करें तो इसका बैंड आपकी पीठ की सीध में आना चाहिए। लेकिन यदि यह ऊपर की तरफ खिसक रहा है तो इसका मतलब है कि आपकी 'ब्रा' का बैंड साइज ज्यादा है। आपको इसे कम करने की जरूरत है।

आखिरी हुक
यह अच्छी बात है कि 'ब्रा' में एडजस्ट करने के लिए 2-3 हुक दिए जाते हैं। इस मामले में मिडिल हुक को सही माना जाता है। मिडिल हुक में 'ब्रा' पहनने से थोड़ा लूज होने पर आप इसे टाइट कर सकते हैं। अगर यह इससे लूज है तो आपका चुनाव गलत है। 

दो उंगली की जगह
यदि आपकी 'ब्रा' के पिछले हिस्से में बैंड के नीचे दो उंगली घुस जाने जितनी जगह भी नहीं बची है तो आपने बहुत टाइट 'ब्रा' पहनी है। आपको थोड़ी सांस लेने की जगह तो छोड़नी चाहिए।
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कंधे पर निशान
अक्सर ही 'ब्रा' इतनी टाइट होती है कि यह आपके कई हिस्सों पर निशान छोड़ देती है। ढीली 'ब्रा' नहीं पहनने का मतलब बहुत ज्यादा टाइट 'ब्रा' भी नहीं पहननी है। इस स्थिति से बचने के लिए सही बैंड साइज का चुनाव करें।


चमड़ी का सिकुड़ना

'ब्रा' पहनने के बाद भी आपकी स्किन फ्लैट ही होनी चाहिए। चूंकि मोटी महिलाओं की चमड़ी मोटी होती है, ऐसे में चमड़ी का सिकुड़ना टाइट 'ब्रा' का साइन ही होता है। इसे नजरअंदाज न करें।

बूब्स का झाँकना

आपकी 'ब्रा' हर स्थिति में आपके शरीर से चिपकी रहती है। यदि हाथ ऊपर करने पर साइड या नीचे से आपके बूब्स झांकने लगते हैं तो यह गलत कप साइज और ढीले बैंड का संकेत है।

सस्ती ब्रा

हम यह नहीं कह रहे हैं कि आपको एक 'ब्रा' खरीदने में हजारों रुपए खर्च करने हैं। लेकिन यदि आप किसी सड़क के ठेले से थोक में 'ब्रा' खरीद कर ला रहे हैं तो यह फायदेमंद नहीं नुकसानदायक है।

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खींच रही है आपका ध्यान
आमतौर पर जब आप घर से बाहर निकलती हैं तो आपका सारा ध्यान आपकी 'ब्रा' पर नहीं होता है। मगर 'ब्रा' के साथ कोई दिक्कत है तो यह बार-बार आपको अपनी याद दिलाएगी। इसलिए बेहतर है कि इस बात पर ध्यान देकर सही साइज और फिटिंग की 'ब्रा' लेकर आएं।

ये बहुत ही छोटी-छोटी सी बातें थी। मगर ये बड़े काम की हैं। यदि आप परफेक्ट लगना चाहती हैं तो इन सब संकेतों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। 
बीमारी से बचना चाहते है तो ना छुए शरीर के ये हिस्से।

बीमारी से बचना चाहते है तो ना छुए शरीर के ये हिस्से।

बीमारी से बचना चाहते है तो ना छुए शरीर के ये हिस्से।

हॉवर्ड स्‍कूल ऑफ डेंटल मेडीसिन में हुए अध्‍ययन से एक निष्‍कर्ष सामने आया है कि हमारे शरीर के मुँह वाले हिस्‍से में लगभग 615 प्रकार के बैक्‍टीरिया होते हैं जो मुँह को बहुत गंदा बना देते हैं।
आइए जानते हैं कि शरीर के और कौन से हिस्‍से बेहद गंदे हैं जो आम इंसान की नज़र से कहीं दूर हैं।


1. मुँह -

आपके मुँह में लगभग 600 बैक्‍टीरियों का वास होता है। ये कोई मज़ाक की बात नहीं; बल्कि गंभीर समस्‍या है। इससे पता चलता है कि शरीर में होने वाले संक्रमण के लिए यहीं बैक्‍टीरिया जिम्‍मेदार होते हैं।

2. बगल -बगल; जिसे आर्मपिट भी कहा जाता है, में लगभग 80 हजार बैक्‍टीरिया होते हैं। यहीं कारण है कि आपको पसीना आने के बाद बगल से दुर्गंध आने लगती है। इसीलिए, आपको हर दिन अपनी बगल को अच्‍छे से साफ करना चाहिए और नियमित रूप से बालों को हटा लेना चाहिए।

3. जीभ -

आप देखेंगे कि कुछ लोगों की जीभ बहुत साफ होती है और कुछ लोगों की जीभ में पीलापन होता है। ये पीलापन या गंदगी, बैक्‍टीरिया के कारण होती है जो जीभ का रंग ही बदल देती है। इसलिए, हर दिन सुबह ब्रश करने के साथ अपनी जीभ को भी टंग क्‍लीनर से साफ करें।




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4. नाखून -
आपने अक्‍सर डॉक्‍टर्स को नाखून न लम्‍बे रखने की सलाह देते हुए सुना होगा। ऐसा वो सफाई के लिहाज़ से कहते हैं। क्‍योंकि नाखूनों में लगभग हजारों की संख्‍या में बैक्‍टीरिया रहते हैं। नाखूनों को साफ रखें और उन्‍हें नियमित रूप से काटते रहें।

5. कान -

कान, शरीर का सबसे गंदा हिस्‍सा होते हैं। इनमें जा होने वाले वैक्‍स की वजह से कान में बैक्‍टीरिया पनपने लगते हैं। इसलिए आपको कानों को साफ रखना चाहिए और इसके लिए इयरबड का इस्‍तेमाल करना चाहिए।
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6. नाभि -
नाभि देखने में बेहद साफ लगती है लेकिन वो साफ होती नहीं है। इसमें कई सारे बैक्‍टीरिया छुपकर बैठे होते हैं। इसलिए, नहाने के दौरान इसे अच्‍छे से साफ करें।

7. पिछला हिस्‍सा -

शरीर का पिछला हिस्‍सा, खासकर एनस गंदा होता है। इसमें काफी सारे बैक्‍टीरिया वास करते हैं।

8. नाक -

नाक के रास्‍ते में बालों के कारण डस्‍ट पार्ट्स रूक जाते हैं और इस वजह से बैक्‍टीरिया पैदा होने लगते हैं। इसलिए, नाक को दिन में दो से तीन बार साफ पानी से साफ कर लें।

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

पीरियड मिस होने के हैं ये आठ कारण, हर महिला को पता होना चाहिए ये बात

पीरियड मिस होने के हैं ये आठ कारण, हर महिला को पता होना चाहिए ये बात


मासिक धर्म या पीरियड्स महिलाओं में होने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है। पीरियड का हर महीने सही समय पर आना प्रत्येक महिला के लिए बहुत जरूरी होता है।

पीरियड का अनियमित होना कई महिलाओं की समस्या होती हैं। वैसे यह जरूरी नहीं कि महिलाओं के पीरियड्स केवल उनके गर्भधारण होने की वजह से ही रुक जाए। इसके पीछे तो कई कारण हो सकते हैं।

आइये जानते हैं कि महिलाओं और युवतियों में ये समस्या किन-किन कारणों की वजह से होती है।


बर्थ कंट्रोल पिल का सेवन:
अगर आप बर्थ कंट्रोल पिल्स का सेवन करती हैं तो यह भी आपके पीरियड मिस होने की एक वजह हो सकती हैं।गर्भनिरोधक दवाओं के सेवन की वजह से शरीर में हार्मोनल असंतुलन बनने लगता है। इसी कारण पीरियड मिस हो सकते हैं।

थायरॉइड की प्रॉब्लम के कारण

हमारे गले में मौजूद थायरॉइड ग्रंथि के कम सक्रिय या अधिक सक्रिय होने के कारण भी शरीर में हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है। इसकी वजह से भी पीरियड मिस हो सकते हैं।

डायबिटीज की वजह से

अगर आप शुगर की मरीज हैं तो आपके शरीर में ब्लड शुगर का लेवल कम या ज्यादा होने पर भी शरीर में हार्मोनल असंतुलन हो जाता है। इस कारण भी पीरियड अनियमित हो सकते हैं।
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बढ़ती उम्र भी है एक वजह

बढ़ती उम्र भी पीरियड के अनियमित होने की या पीरियड न आने की एक वजह हो सकती है। महिलाओं की उम्र 40 पार हो जाने के बाद भी कुछ परेशानियां हो सकती है, जिस वजह से पीरियड मिस हो जाते हैं।

वजन का पड़ता है प्रभाव

महिलाओं का वजन भी पीरियड्स को प्रभावित करता है। मोटापे का बढ़ना हमारे दिमाग की ग्रंथियों पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है। इसकी वजह से शरीर में हार्मोन्स का अंसुतलन हो जाता है और पीरियड्स मिस हो सकते हैं।
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तनाव भी है एक कारण
लगातार तनाव से ग्रस्त रहने से बॉडी में एस्ट्रोजेन और कॉर्टिसोल नामक हार्मोन रिलीज होने लगते हैं। इस कारण पीरियड्स अनियनमित हो जाते हैं।

व्यायाम की अधिकता की वजह से

जरूरत से ज्यादा व्यायाम या शारीरिक श्रम करने से शरीर में पर्याप्त मात्रा में एस्ट्रोजेन हार्मोन रिलीज नहीं हो पाता हैं, इस वजह से पीरियड समय पर नहीं आते हैं।
पानी को बार-बार नहीं उबालना चाहिए, वरना हो सकते हैं कई नुकसान

पानी को बार-बार नहीं उबालना चाहिए, वरना हो सकते हैं कई नुकसान


पानी को उबलने से पानी की अशुध्दियां दूर होती हैं। ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन पानी को बार-बार उबालना फायदे की जगह नुकसान पहुंचाता है। जी हां,उबले हुए पानी को फिर से उबालकर इस्तेमाल में लाना खतरनाक हो सकता है। इससे हमारे स्वास्थ्य पर कई बुरे प्रभाव पड़ते हैं।


आइए जानते हैं पानी को बार-बार उबालने के क्या होते हैं दुष्प्रभाव।

ज़्यादा उबालने से उलट हो जाते हैं पानी के घटक

उबले हुए पानी को बार-बार उबालना और फिर इस्तेमाल करना आपकी सेहत पर विपरीत प्रभाव डालता है क्योंकि इससे पानी जिन घटकों से मिलकर बना होता है वो उलट हो जाते हैं जो हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं।

ज्यादा उबालने से पानी में होते है कई केमिकल रिएक्शन

जब हम एक बार पानी को उबालकर ठंडा करते हैं तो पानी में उपस्थित सभी मिनरल सेट हो जाते हैं लेकिन जब एक बार फिर हम इसे उबालते हैं तो उसमें दोबारा से कुछ रासायनिक प्रक्रियाएं होती है जिनसे सब कुछ संतुलित मात्रा से कम या ज्‍यादा हो जाता है।
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बढ़ जाती है टॉक्सिक नाईट्रेट की मात्रा
पानी में बार-बार उबालने से पानी में मौजूद नाईट्रेट, टॉक्सिन्स में बदल जाता है। इससे कई प्रकार के कैंसर हो सकते हैं।

आर्सेनिक इंटॉक्सिकेशन भी बढ़ जाता है

एक हद से ज्‍यादा पानी को गर्म करने पर आपको आर्सेनिक की घातक मात्रा पानी में मिलेगी। इससे कई तरह की घातक बीमारियां जैसे, कैंसर, हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही इससे महिलाओं एवं पुरूषों की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है।
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ज्यादा उबला हुआ पानी पचाना भी होता है मुश्किल
पानी को बार-बार उबालने से यह भारी हो जाता है जिसे पचाना भी मुश्किल होता है।इससे पेट से जुड़े कई रोग भी हो सकते हैं।

फ्लोराइड की उच्च मात्रा भी पहुंचाती है नुकसान

पानी को ज्‍यादा उबालने पर इसमें फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्‍यादा हो जाती है, जिसके कारण दिमागी बीमारी होने का खतरा रहता है। खासकर बच्चों के लिए यह बहुत ही खतरनाक है।
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ज़्यादा उबालने से वापस पानी में मिल जाती है भाप

पानी को बार-बार उबालने से उसकी भाप निकलकर वापस उसी में चली जाती है, जो बहुत ही नुकसानदायक होती है।

कब और कितना उबालें पानी

पानी को सिर्फ एक बार उबालना चाहिए। इस्तेमाल से पहले पानी को 20 मिनट तक उबालें और उसके बाद इसे किसी बर्तन में ढककर ठंडा होने के लिए छोड़ दें।
आप शारीरिक शक्ति बढ़ाना चाहते हैं तो ध्यान रखें चाणक्य की ये नीति

आप शारीरिक शक्ति बढ़ाना चाहते हैं तो ध्यान रखें चाणक्य की ये नीति

आचार्य कहते हैं हमारे शरीर के लिए खड़े अन्न में बहुत बल होता है, लेकिन खड़े अन्न से भी दस गुना अधिक बल आटे में होता है

अच्छी सेहत के लिए कई तरह के अन्न, दूध, सब्जियां, घी आदि आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इन चीजों से शरीर को काफी ऊर्जा प्राप्त होती है और हम लगातार काम करते रहते हैं। खाने की हर चीज से मिलने वाली ऊर्जा का अनुपात अलग-अलग होता है। आचार्य चाणक्य ने एक नीति में बताया है कि खाने की किस खास चीज में कितना बल होता है और किस चीज को खाने से शरीर को क्या लाभ होता है...


आचार्य चाणक्य कहते हैं कि-
अन्नाद्दशगुणं पिष्टं पिष्टाद्दशगुणं पय:।
पयसोथऽष्टगुणं मांसं मांसाद्दशगुणं घृतम्।।

खड़े अन्न से दस गुना अधिक ऊर्जा उसके आटे में :
 इस श्लोक में आचार्य कहते हैं कि हमारे शरीर के लिए खड़े अन्न में बहुत बल होता है, लेकिन खड़े अन्न से भी दस गुना अधिक बल उसके आटे में होता है। आटे से बनी रोटियां पचाने में हमारे पाचन तंत्र को अधिक सुविधा रहती है। इस कारण खड़े अन्न से अधिक उसके आटे से शरीर ज्यादा ऊर्जा ग्रहण कर पाता है। यह ऊर्जा व्यक्ति को दिनभर काम करने के लायक बनाए रखती है।

आटे से दस गुना अधिक बल होता है दूध में :
इस नीति के अनुसार अन्न के आटे से भी दस गुना अधिक बल दूध में होता है। भैंस के दूध से गाय का दूध अधिक पौष्टिक और बल देने वाला होता है। यदि हम नियमित रूप से दूध का सेवन करते हैं तो कई प्रकार के रोगों से बचे रहते हैं। दूध स्त्री और पुरुष, दोनों को समान रूप से लाभ पहुंचाता है।
गाय के दूध में कई ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। दूध सुपाच्य भी होता है यानी आसानी से पच जाता है।
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दूध से आठ गुना अधिक बल होता है मांस में :
आचार्य कहते हैं दूध बल देने वाला होता है, लेकिन मांसाहार में दूध से आठ गुणा अधिक बल होता है। मांसाहार को प्रकृति के विरुद्ध माना गया है, शास्त्रों के अनुसार किसी भी जीव की हत्या करना पाप है। इसी वजह से मांसाहार से बचना चाहिए, चाणक्य ने मांसाहार से अधिक बल देने वाली एक और शाकाहारी चीज बताई है। मांसाहार का सेवन करने से बेहतर से उस चीज का सेवन किया जाए।
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मांसाहार से भी दस गुना अधिक बल होता है घी में :
चाणक्य कहते हैं कि मांसाहार से भी दस गुना अधिक बल गाय के दूध से बने घी में होता है। घी बहुत पौष्टिक और शरीर को बल प्रदान करने वाला होता है। नियमित रूप से शुद्ध घी का सेवन किया जाए तो व्यक्ति लंबे समय तक बुढ़ापे के रोगों से बचे रह सकता है।

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

ये 7 बातें बताती हैं लिवर ख़राब होने के लक्षण

ये 7 बातें बताती हैं लिवर ख़राब होने के लक्षण

लिवर की खराबी के बहुत से कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक मुख्य कारण है शराब का सेवन करना और भोजन में मिर्च-मसाले ज़्यादा खाना। इसके अलावा भी इसके कई अन्य कारण हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि इस वजह से हमारे शरीर में कुछ बदलाव आने लगते हैं जिन्हें हम नज़र अंदाज़ कर देते हैं।


यदि आपका पेट बढ़ रहा है तो आप यही सोचेंगे की यह मोटापे की वजह से हो रहा होगा। पर क्या आप जानते हैं कि लिवर के ख़राब होने से भी पेट पर सूजन आने लगती है, जिसकी वजह से पेट फूलने लगता है। इन्ही बातों को ध्यान रखते हुए यह लेख लिखा गया है।

आइये जानते हैं लिवर की खराबी के लक्षण।

मुँह से बदबू आना

मुँह में अमोनिया की मात्रा बढ़ जाने के कारण मुँह से बदबू आने लगती है। लिवर में खराबी के कारण ऐसा होने लगता है, मुँह की बदबू को नज़र अंदाज़ ना करें, यह एक गंभीर रूप ले सकती है।

थकान भरी आँखें और डार्क सर्कल 

यदि आपको हमेशा थका-थका सा महसूस होता है। आप रात में जितनी भी नींद क्यों ना लें आपको यही लगता है कि आपकी नींद पूरी नहीं हुई है। आँखों में डार्क सर्कल होने लगते हैं और आँखे सूजने लगी हो तो यह अच्छा संकेत नहीं है।
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पाचन तंत्र में परेशानी

लिवर में खराबी का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि आपका हाज़मा ठीक नहीं रहता। यदि आप ज़्यादा मिर्च मसाले खा लेते हैं तो सीने में जलन होने लगती है। हाज़मे की खराबी लिवर में प्रॉब्लम को दर्शाती है।

चेहरे पर सफ़ेद धब्बे

कभी-कभी चेहरे की रंगत पीली पड़ने लग जाती है और चेहरे पर सफ़ेद धब्बे पड़ने लगते हैं। यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है तो यह अच्छा संकेत नहीं है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से संपर्क अवश्य करें ।

आँखों में पीलापन

यदि आँखों का सफ़ेद भाग, पीला पड़ने लग जाए तो यह भी परेशानी का सबब हो सकता है। आँखों के पीले पड़ने को नज़रअंदाज़ ना करें, यह कोई गंभीर रूप ले सकती है। लिवर के खराब होने पर आँखों का सफ़ेद रंग पीला पड़ने लगता है और नाख़ून भी पीले पड़ने लगते हैं।
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खाने में स्वाद ना आना
यदि आपको खाने में कोई स्वाद महसूस नहीं होता। आपसे खाना नहीं खाया जाता तो यह भी ध्यान देने वाली बात है।  लिवर में एक एन्ज़ाइम होता है जिसे बाइल कहते है जो की बहुत कड़वा होता है। लिवर के ख़राब होने पर, बाइल मुँह तक पहुँचने लगता है जिसकी वजह से मुँह का स्वाद ख़राब हो जाता है।

पेट पर सूजन

पेट का बड़ा होना, हमेशा मोटापे को ही नहीं दर्शाता। यदि दिन-ब-दिन आपका पेट बड़ा होता जा रहा है, तो हो सकता है कि आपके पेट पर सूजन आ रही हो। लिवर में खराबी के कारण भी पेट पर सूजन आ जाती है।
सावधान! 'गले के कैंसर' की ओर इशारा करते हैं ये लक्षण

सावधान! 'गले के कैंसर' की ओर इशारा करते हैं ये लक्षण


कैंसर वो बीमारी है, जिसमें कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। शरीर में फैलने लगती हैं। वैसे तो कैंसर कई प्रकार का होता है। इन्हीं में से एक 'गले का कैंसर' भी होता है'गले का कैंसर' वॉइस बॉक्स, वोकल कॉर्ड्स और गले के अन्य हिस्सों जैसे टॉन्सिल्स और Oropharynx आदि को प्रभावित करता है।

'गले के कैंसर' से अन्य तरह के कैंसर की तुलना में कम लोग ग्रसित होते हैं। कुल जनसंख्या के तकरीबन 1% लोग ही गले के कैंसर की चपेट में आते हैं। गले के कैंसर को मुख्य रूप से दो कैटेगरीज में बांटा गया है, जिनमें Pharyngeal cancer और Laryngeal कैंसर का नाम शामिल हैं।


गले के कैंसर के जितने भी प्रकार होते हैं, वो इन्हीं दो कैटेगरी के अंतर्गत आते हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में गले का कैंसर होने की अधिक आशंका होती है। स्मोकिंग, शराब का सेवन, विटामिन ए की कमी और डेंटल हाइजीन खराब होना जैसी बातें गले के कैंसर का कारण बनती हैं।

वैसे गले के कैंसर को शुरुआती स्टेज में पहचान पाना मुश्किल है। आमतौर पर गले के कैंसर में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं। आज हम आपसे उन्हीं के बारे में बात करेंगे।

#10 आवाज में बदलाव
आवाज बदल जाना कोई बड़ी बात नहीं है। अक्सर ही गला सूख जाने पर या सर्दी हो जाने में आवाज बदल ही जाती है। लेकिन आवाज का लंबे समय तक बदले रहना गले के कैंसर का भी सूचक है।
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#9 वजन घटना
वजन घटना और बढ़ना भी आम बात है। अक्सर बीमार पड़ने के बाद या डाइट चेंज होने पर वजन कम हो जाता है। मगर यदि वजन बिना किसी कारण के लगातार घट रहा है तो इसकी वजह कैंसर भी हो सकती है।

#8 निगलने में दिक्कत होना 
जब किसी ठोस या तरल पदार्थ को निगलने में समस्या आती है तो इस स्थिति को 'dysphagia' कहते हैं। एसिड रिफ्लक्स, सीने में जलन आदि कई समस्याएं हैं, जिसकी वजह से निगलने में दिक्कत होती है। साथ ही ऐसा गले का कैंसर होने पर भी होता है।
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#7 गले में खराबी
गले में खुजली, इरिटेशन और दर्द होना आदि गला खराब होने (सोर थ्रोट) के अंतर्गत आता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें एक 'गले का कैंसर' भी है।

#6 कफ बने रहना 
बदलते मौसम के साथ कफ का हो जाना आम बात है। यदि यह कफ कई दिनों तक बना हुआ है और उसमें खून भी आ रहा है तो यह सावधान होने की चेतावनी है।

#5 गले में सूजन
लिम्फ नोड्स वो ग्रंथियां होती है जो लिम्फ (एक तरह का फ्लूड) को फिल्टर करती है। कुछ इन्फेक्शन्स की वजह से लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाती है। लिम्फ नोड्स में सूजन कैंसर की वजह से भी आती है।
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#4 सांस लेने में दिक्कत 
गले के कैंसर का एक लक्षण सांस लेने में तकलीफ लेना भी है। इसके अलावा सांस लेते वक्त सीटी की आवाज आना (Wheezing) भी इस कैंसर का लक्षण है।

#3 कान में दर्द 
सर्दी होने पर अक्सर ही कान में खुजली की समस्या हो जाती है या अधिक मेल जम जाने पर कान दर्द करते हैं। लेकिन कान का दर्द लंबे समय तक बना रहे या सिरदर्द की समस्या भी तो यह गले का कैंसर भी हो सकता है।
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#2 इन अंगों में सूजन
गले का कैंसर सिर्फ गले के हिस्सों को ही प्रभावित नहीं करता है। बल्कि गले के साथ ही आँख, गर्दन, और जबड़े में सूजन आना भी गले के कैंसर के लक्षण हैं।

#1 गले में खराश 
अक्सर ही गले में खराश हो जाना या गले को साफ करने की जरूरत पड़ जाना तो आपको याद ही होगा। आमतौर पर यह समस्या कुछ ही देर के लिए होती है। मगर यह लंबे समय तक बने रहे तो इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
अखबार पर खाना रखकर खाने या पैक करने से पहले पढ़ें ये खबर

अखबार पर खाना रखकर खाने या पैक करने से पहले पढ़ें ये खबर


क्या अखबार पर खाना  रखकर खाना  सही है ?अक्सर देखा जाता  है की लोग जब घर से बाहर होते है तो अखबारों पर रख कर भोजन करते है, या खाना घर से अखबार में पैक करके लेकर जाते है।


लेकिन देश के खाद सुरक्षा नियामक FSSAI ने ऐसा करने वालों को सचेत किया है और कहा है की खाने की चीज़ों को अखबार में पैक करना, रखना या उसपर कहना बहुत खतरनाक हो सकता है। एफ एस एस ऐ आई ने बताया की ऐसा करने से लोगों के शरीर में कैंसर जैसे घातक रोग को पैदा करने वाले कारक तत्व पहुँचते है।

भारतीय खाद सुरक्षा एवं मानक प्राधिकार ने लोगों को अखबार पर खाने की चीज़ें नहीं रखने की राय दी है और कहा है की खाना घर पर कितना ही अच्छा बना हो, स्वच्छ और हेल्दी बना हो लेकिन अखबार के संपर्क में आते ही वह अस्वास्थ्यकारी हो जाता है और  नुक्सान पहुंचाता है।
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ऐसा क्यों होता है ?
क्योंकि अखबार छापने में इस्तमाल होने वाली स्याही में कई तरह के खतरनाक बायोएक्टिव तत्व होते है जिसका हमारे शरीर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही प्रकाशन स्याही में भी नुकसानदायक कलर, पिगमेंट और परिरक्षक हो सकता है जो की हमारे शरीर में खाने के साथ लगकर अंदर चला जाता है जो की बहुत हानिकारक साबित हो सकता है।
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इसीलिए FSSAI ने लोगों को खाने को अखबार में पैक कर देने और उसपर खाने को लेकर लोगों को आगाह किया है और इस सन्दर्भ में सभी स्टेट के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को कहा है की इस जानकारी को सभी तक पहुंचाए। 

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

ये संकेत दिखाई दे तो समझ जाना आपकी किडनी फेल हो रही है

ये संकेत दिखाई दे तो समझ जाना आपकी किडनी फेल हो रही है


किडनी हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। किडनी का काम शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालना होता है जिससे शरीर कई तरह की बीमारियों से दूर रहता है। ऐसे में किडनी का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है लेकिन कई बार लाइफस्टाइल और गलत खान-पान के कारण किडनी पर बुरा असर पड़ता है।


किडनी खराब होने के बारे में पता लगाना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में जब शरीर में कुछ संकेत दिखाई दें तो समझ लेना चाहिए कि किडनी फेल हो रही है...

1. किडनी शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती है लेकिन जब किडनी खराब हो जाती है तो शरीर में फालतू पदार्थ जमा हो जाते हैं जिससे टिशू में सूजन आ जाती है और वजन बढ़ने लगता है।

2. अगर आपको सामान्य के हिसाब से यूरिन कम आता है तो समझ लेना चाहिए कि किडनी सही तरह से काम नहीं कर रही।
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3. किडनी हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को संतुलित रखती है लेकिन जब किडनी खराब हो जाती है तो शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो जाता है और एनीमिया की समस्या हो जाती है। ऐसे में खून की कमी होने पर व्यक्ति हर समय थकान महसूस करता है।

4. किडनी शरीर से फालतू पदार्थ बाहर निकालने का काम करती है लेकिन जब यह सही तरीके से काम नहीं करती तो विषैले पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते और भूख कम लगने लगती है।

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

हो जाइये सावधान ! अगर बैठे-बैठे पैर हिलाने की है आदत !

हो जाइये सावधान ! अगर बैठे-बैठे पैर हिलाने की है आदत !


जब भी हम कभी फ्री बैठे होते हैं तो खेल-खेल में अपने पैरों को हिलाने लगते हैं।
उसके बाद ये खेल धीरे-धीरे आदत में शुमार होने लगता है। लेकिन यदि आपको बैठने के साथ-साथ लेटकर भी पैरों को हिलाने की आदत है तो ज़रा सावधान हो जाइये क्योंकि पैरों को हिलाने की ये आदत आपके लिए खतरनाक साबित हो सकती है।


पैर हिलाने की आदत आपके व्यक्तित्व में तो गिरावट लाती ही है साथ ही सेहत के लिहाज से भी ये ठीक नहीं है। आइये जानते हैं पैर हिलाने के क्या-क्या कारण हो सकते हैं।

यदि आप के अंदर भी ये बुरी आदत है तो हो सकता है आप रेस्टलेस सिंड्रोम के शिकार हों। इसकी मुख्य वजह आयरन की कमी होना है।

35 वर्ष से अधिक लोगों में पाई जाती है ये समस्या
यह नर्वस सिस्टम से जुड़ा रोग है। यह समस्या 10 प्रतिशत लोगों में होती ही है, इसके लक्षण अधिकतर 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोगो में पाए जाते हैं।

क्या होता है रेस्टलेस सिंड्रोम
पैर हिलाने पर मनुष्य के शरीर में डोपामाइन नामक हार्मोन स्त्रवित होने लगता है। जिससे मनुष्य को अच्छा लगने लगता है और उसे बार-बार पैर हिलाते रहने का मन करता है।

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इसे स्लीप डिसऑर्डर भी कहा जाता है नींद पूरी न होने पर मनुष्य बहुत थका हुआ महसूस करता है। बॉडी में इसका पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट किया जाता है।

यह रोग मुख्यतः आयरन की कमी के कारण होता है। इसके अलावा किडनी, पार्किंसस से पीड़ित मरीजों और गर्भवती महिलाओं के हार्मोनल बदलाव भी इसके होने के कारण हो सकते हैं।

ह्रदय रोगियों के लिए खतरा
शुगर, बीपी और ह्रदय रोगियों के लिए ये काफ़ी खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए भरपूर नींद लें और सिगरेट शराब के सेवन से बचें।

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इलाज है संभव
इस बीमारी के इलाज के लिए आयरन की दवा ली जाती है साथ ही हॉट और कोल्ड बाथ तथा वाइब्रेटिंग पैड पर पैर रखने से छुटकारा भी मिलता है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

अगर इस तरह बैठा दिखे कोई बच्चा, तो तुरंत उसके पैर सीधे कर दीजिए

अगर इस तरह बैठा दिखे कोई बच्चा, तो तुरंत उसके पैर सीधे कर दीजिए

बच्चों को पालना हर पेरेंट्स के लिए काफी चैलेंजिंग होता है। उनके उठने से लेकर सोने तक, हर चीज का ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन कई बार कुछ ऐसी छोटी-छोटी चीजें पेरेंट्स नजरअंदाज कर बैठते हैं, जिसकी वजह से बाद में बच्चों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ जाता है। ऐसी ही चीजों में शामिल है बच्चों का पैर को कुछ इस तरह मोड़कर बैठना।  सावधान होने की है बारी... 

तस्वीर में दिख रहा बच्चा जिस अंदाज में बैठा है, उसे 'W सिटिंग' कहते हैं। इसमें बच्चे अपने पैरों को इस तरह मोड़कर बैठते हैं कि उनके पैर W की तरह दिखते हैं। कई बच्चों में इस तरह बैठने की आदत होती है। पेरेंट्स भी इसे उनका स्टाइल समझ नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन इस तरह बैठना उनके लिए काफी खतरनाक हो सकता है। अगर आपको अपने आसपास कोई बच्चा इस तरह बैठा दिखे, तो उसके पैर तुरंत सीधे कर दीजिए। इससे बच्चे को बाद के समय में काफी परेशानी उठानी पड़ सकती है। 

क्या होता है नुकसान? 
 'W सिटिंग' में बैठना बच्चों के लिए काफी खतरनाक होता है। इसकी वजह से बच्चों के हिप्स, घुटनों और एड़ियों पर काफी स्ट्रेस पड़ता है। साथ ही, जो बच्चा इस तरह बैठता है, उसे अपनी आगे की लाइफ में रीढ़ से संबंधित कई तरह की बीमारियां भी हो जाती हैं। इस पोज में बैठने वाले ज्यादातर बच्चे बड़े होने पर हड्डियों की बीमारी के शिकार हो जाते हैं।

क्या करना चाहिए?
आगे कोई बच्चा इस तरह से बैठा दिखाई दे, तो तुरंत उसके पैर सीधे कर दीजिए। पेरेंट्स को भी बच्चों पर ध्यान रखना चाहिए कि वो आगे अपने बच्चों को इस तरह नहीं बैठने दें।