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बुधवार, 8 जुलाई 2020

मुँह में कैंसर होने के से पहले ये संकेत दिखाई देते है

मुँह में कैंसर होने के से पहले ये संकेत दिखाई देते है



कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी है जो भारत में बड़ी ही तेजी से बढ़ती जा रही है आए दिन किसी न किसी को कैंसर की शिकायत होती है जिसके चलते वह धीरे-धीरे मौत के मुंह में जाने लगता है कैंसर का अभी कोई परमानेंट इलाज नहीं आया है।

और यदि इसका इलाज है तो यह बहुत ही महंगा होता है इसमें लोगों के लाखों से करोड़ों रुपए तक खर्च हो जाते हैं कैंसर होने के पीछे बहुत से कारण होते हैं जिसमें ज्यादातर शराब पीना तंबाकू खाना गलत खानपान घाव होना इत्यादि लेकिन मुंह में यदि कैंसर होता है तो यह हमें कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है।

आप भी मुंह के कैंसर होने के संकेत जान लें जिससे आप जल्द से जल्द इसका इलाज करा सके क्योंकि यदि इसको शुरू में ही पता कर लिया जाए तो यह ठीक किया जा सकता है आइए जानते हैं मुंह के कैंसर होने के संकेत।
 

1. मुह में सफेद या लाल चकता होना या घाव होना

यदि मुहं में कहीं सफेद या लाल चकता होता है या फिर कहीं मुंह में आपको घाव हो गए हैं तो आप इस को जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाकर इसका इलाज करा लें क्योंकि यदि घाव ज्यादा दिन तक ठीक नहीं होता तो यह कैंसर होने का लक्षण होता है।

2. किसी जगह त्वचा का कड़ा होना या गांठ होना

यदि आपकी त्वचा पर कहीं पर गांठ सफल रही हो तो फिर इस गांठ का इलाज जल्द से जल्द करा लें क्योंकि कैंसर होने से पहले शरीर में गांठ से उभरने लगती है जो जल्दी ठीक नहीं होती यह भी कैंसर का कारण हो सकता है।
 

3. इस घाव जो एक महीने या इससे ज्यादा दिनों तक न भरे

यदि शरीर में कहीं घाव हो गया है और दवाई लगाने पर भी ठीक नहीं हो रहा और यह एक महीने से ज्यादा यदि हो जाता है तो यह कैंसर का कारण हो सकता है।

4. मसालेदार भोजन का मोह के अंदर सहन न होना

यदि किसी व्यक्ति को खाना खाते वक्त हल्का सा मसाला भी बहुत तेज लगता है यह यानी वह उस मसालेदार भोजन को सहन नहीं कर पाता तो समझ ले के मुंह में कैंसर के लक्षण दिखाई दे रहे हैं तो आप डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।


5. मुह खोलने या जीभ बाहर निकालने में परेशानी होना

यदि किसी व्यक्ति को मुंह खोलने में परेशानी होती है या फिर बाहर निकालने में भी परेशानी और तकलीफ का सामना करना पड़ता है तुझे भी मुंह के कैंसर होने का संकेत और लक्षण होता है।

7. आपकी आवाज में परिवर्तन होना

अत्यधिक लार का बहना या स्राव होनाच बाने निगलने या बोलने में कठिनाई होना कोई भी कैंसर के संकेत होते हैं ।अगर इनमे से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाए।
 

मुंह के कैंसर के लक्षण

आप किसी भी लक्षण को नोटिस नहीं कर सकते। लेकिन सबसे आम लक्षण है आपके गाल या होंठ के अंदर किसी प्रकार का घाव है, जो ठीक न हो रहा हो। आप अपने मुंह में एक गांठ महसूस कर सकते हैं या फिर लाल या सफेद रंग का पैच देख सकते हैं। मुंह में सुन्नपन जैसा महसूस होना, दर्द, रक्तस्राव, या कमजोरी, साथ ही आवाज में बदलाव, कान बजना और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। बिना किसी स्पष्ट कारण के दांत गिर भी सकते हैं। लेकिन ये कम गंभीर समस्याओं के संकेत भी हो सकते हैं। अगर आपको कोई लक्षण दिखाई देता है तो आप अपने डॉक्टर को बताएं और इसका कारण जानने की कोशिश करें।

किन्हें होता है मुंह का कैंसर

वे महिलाएं और पुरुष, जो 45 साल की उम्र से ज्यादा है उन्हें मुंह का कैंसर होने की संभावना अधिक होती है हालांकि ये किसी भी उम्र में हो सकता है। जिन लोगों की त्वचा गोरी होती है उन्हें होंठ का कैंसर होने की संभावना अधिक होती है। और कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि वे लोग, जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है या फिर एचआईवी जैसी लंबी बीमारी से पीड़ित हैं उनमें उम्र के साथ-साथ मुंह का कैंसर होने की संभावना अधिक होती है।
 

कैसे करें मुंह के कैंसर का उपचार

डॉक्टर और डेंटिस्ट आमतौर पर नियमित चेक-अप के दौरान मुंह के कैंसर का पता लगा सकते हैं। अगर उन्हें किसी भी समस्या का कोई संकेत मिलता है तो वह आपके मुंह और गले के भीतर बड़ी सावधानी से देखते हैं। कभी-कभार वह किसी विशेष उपकरण का प्रयोग करते हैं और आपको अपने जबड़े, गर्दन में गांठ जैसा महसूस हो सकता है।अगर उन्हें कुछ मिलता है तो बायोप्सी नाम के टेस्ट के जरिए कैंसर की पुष्टि में मदद मिल सकती है।

Disclaimer : इस आर्टिकल में बताई विधि, तरीक़ों व दावों की AyurvedPlus.com पुष्टि नहीं करता है. इनको केवल सुझाव के रूप में लें. इस तरह के किसी भी उपचार/दवा/डाइट पर अमल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें.

यदि आपको जानकारी पसंद आये तो आप इसे अधिक से अधिक शेयर कीजिये। और इस पोस्ट को लाइक और कमेन्ट कीजिये आपको ये कैसी लगी और हमे फॉलो करना न भूलें ।

सोमवार, 7 मई 2018

अगर आपको भी मिल रहे है ये संकेत,तो हो सकता है पेट का कैंसर

अगर आपको भी मिल रहे है ये संकेत,तो हो सकता है पेट का कैंसर


आपने बहुत से लोगों को उनकी सेहत को लेकर चिंतित होते हुए देखा होगा. जिसके बाद वो डॉक्टर से सलाह लेकर उन दवाइयों का सेवन करते हैं, जिसके बारे में उन्हें डॉक्टर लिख कर देते हैं, लेकिन फिर भी कभी-कभी स्वस्थ से जुड़ी हुई इन परेशानियों को ख़त्म करने में हमें सफलता नहीं मिल पाती. ऐसे में बहुत सी ऐसी बीमारियां भी होती हैं जो बेहद खतरनाक होती है. इन बीमारियों की वजह से व्यक्ति की मौत भी हो सकती हैं.

अक्सर हम जिन बीमारियों को छोटा-मोटा समझकर खुद ही उनका इलाज करने लगते हैं असल में वो बीमारियां बहुत बड़ी बीमारियां होती है. आप सभी ने कैंसर की बीमारी के बारे में तो सुना ही होगा. इस बीमारी का नाम सुनकर ही अच्छे-अच्छों के पसीने निकल जाते हैं.

ये एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में हमें जल्दी से पता नहीं चल पाता. आज हम आपको कैंसर से जुड़े हुए कुछ संकेतो के बारे में बताने जा रहे हैं. वैसे तो कैंसर बहुत तरह का होता है, लेकिन आज हम आपको पेट से जुड़े हुए कैंसर के लक्षण के बारे में बताने जा रहे हैं.

पहला संकेत
अगर आपके पेट में बहुत समय से हल्का-हल्का दर्द रहता है, आपको कब्ज है,पेट में सूजन हैं तो इसका अर्थ ये हुआ कि आगे चलकर आपको पेट का कैंसर हो सकता है, जिसकी वजह से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है. जिसको भी ये बीमारी होगी उसके कमर का आकार धीरे-धीरे करके बढ़ने लग जायेगा.

दूसरा संकेत
अगर आपका वजन अचानक से कम होने लग गया है तो आपके लिए ये चिंता की बात है, क्योंकि वजन कम होना भी कैंसर का एक बहुत बड़ा लक्षण है. फेफड़ों, पेट में होने वाले कैंसर की वजह से सबसे पहले व्यक्ति का वजन ही कम होता है.

तीसरा संकेत
अगर आपको हमेशा कब्ज रहता है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि कोलोन कैंसर की वजह से व्यक्ति को हमेशा कब्ज की समस्या रहती है,लेकिन अगर समय रहते इसका पता लगा लिया जाए तो इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है.

मंगलवार, 13 मार्च 2018

क्या आपका बच्चा भी दिन भर मोबाइल में लगा रहता है? तो ये ख़बर आपके लिए है

क्या आपका बच्चा भी दिन भर मोबाइल में लगा रहता है? तो ये ख़बर आपके लिए है


ब्रिटिश रिसर्चर विशालकाय रिसर्च की तैयारी में हैं कि क्या मोबाइल फोन या दूसरे वायरलेस उपकरणों से बच्चों के दिमाग के विकास पर भी असर पड़ता है? मोबाइल के इस्तेमाल से मस्तिष्क के कैंसर के खतरे पर कई रिसर्च पहले हो चुकी है.

ज्ञान, किशोरावस्था और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर आधारित ‘स्कैंप’ नाम के इस प्रोजेक्ट में उनकी याद्दाश्त और ध्यान जैसी बातों पर गौर किया जाएगा. देखा जाएगा कि किशोरावस्था में इनका किस तरह विकास होता है. यह ठीक वही समय है, जब किशोर मोबाइल फोन और इसके जैसे अन्य वायरलेस उपकरण इस्तेमाल करना शुरू करते हैं.

कैंसर का खतरा

इस बात के अब तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं कि मोबाइल से निकलने वाली रेडियो तरंगें स्वास्थ्य पर खराब असर डालती हैं. हालांकि इस बारे में कई रिसर्च की जा चुकी हैं और कई जारी हैं. अब तक ज्यादातर रिसर्चों में वयस्कों पर और उनमें मस्तिष्क के कैंसर के खतरे पर ज्यादा तवज्जो दी जाती रही है.

लेकिन अब वैज्ञानिक ध्यान देना चाहते हैं कि क्या बच्चों के विकसित हो रहे दिमाग को वयस्कों के मुकाबले ज्यादा खतरा हो सकता है? इसकी एक वजह तो यह है कि उनका तंत्रिका तंत्र इस उम्र में विकसित हो रहा होता है. दूसरी वजह यह कि कम उम्र में मोबाइल का इस्तेमाल शुरू करने की वजह से वे मोबाइल की रेडियो तरंगों का ज्यादा लंबे समय तक सामना करते हैं.

बच्चों पर असर

लंदन के इंपीरियल कॉलेज में सेंटर फॉर इंवायरमेंट एंड हेल्थ के निदेशक पॉल एलियट कहते हैं, “अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण वयस्कों के 10 साल तक मोबाइल इस्तेमाल करने के बाद इससे निकलने वाली रेडियो तरंगों और ब्रेन कैंसर के बीच किसी तरह का संबंध नहीं दिखाते हैं.” वह कहते हैं कि, “लेकिन इसके ज्यादा लंबे समय तक इस्तेमाल और बच्चों द्वारा इस्तेमाल के बारे में मौजूदा प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं.”

वजन पर दें ध्यान

जन्म के समय जिन बच्चों का वजन चार किलोग्राम या उससे ज्यादा होता है, वह बड़े हो कर मोटापे का शिकार हो सकते हैं. इसीलिए इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि गर्भवती महिलाएं अत्यधिक खानपान से दूर रहें, कसरत करती रहें और उन्हें डायबिटीज न हो.

मोबाइल फोन का इस्तेमाल दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक मोबाइल यूजरों की संख्या करीब 4.6 अरब है. ब्रिटेन में 11-12 साल की उम्र के 70 फीसदी बच्चे और 14 साल की उम्र के करीब 90 फीसदी बच्चे मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.

बच्चो  पर मोबाइल के बुरे प्रभाव और बचाव

किसी भी देश के लिए बच्चे ही उस देश का भविष्य होते है और जिस देश की युवा पीढ़ी समझदार और स्वस्थ होती है उस देश का विकास भविष्य में निश्चित है और दुनिया के हर सभी देश / Country यही चाहते है की उनके देश के नागरिक और उस देश के बच्चे अधिक से अधिक पढ़े लिखे और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे और यह तभी सम्भव होता है जब युवा पीढ़ी और बच्चे अधिक से अधिक Technology से जुड़ते है और Technology और नये नये आविष्कारो से पूरी दुनिया को एक नई दिशा दे इसी मानव विकास की कड़ी में मोबाइल / Mobile और स्मार्टफोन / Smartphone एक ऐसी उपलब्धी है जिससे कोई भी अछूता नही रहा है और खासकर आजकल के बच्चो का दिनचर्या का एक बड़ा समय मोबाइल में नष्ट हो रहा है जो कही न कही बच्चो पर मोबाइल के दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे है यदि समय रहते हम नही चेते ओ निश्चित ही हमारे सुख के साधन हमारी बर्बादी के कारण भी बन सकते है

जैसा की कबीरदास जी ने भी कहा है

“अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप”

अर्थात जब जब भी किसी चीज की अधिकता होती है तो वही अधिकता बर्बादी का कारण भी बनती है

जब मोबाइल फोन का अविष्कार हुआ तो इसका प्रयोग लोगो तक इसके माध्यम से अपनी कही गयी बातो को पहुचाना होता है लेकिन समय रहते Phone में क्रन्तिकारी बदलाव के कारण यही फोन अब Smartphone में बदल गया जिसके कारण अब लोग घंटो तक इन्ही Smartphone में व्यस्त रहते है जिसके कारण कही न कही हम एक साथ रहते हुए अपनों से दूर होते जा रहे है

तो आईये जानते है किस प्रकार से मोबाइल फोन से बच्चो को खतरा है और कैसे बच्चो को मोबाइल से कैसे दूर रखे

बच्चो पर मोबाइल के विपरीत प्रभाव

जब भी कभी माता पिता अपने कामो की अधिकता और व्यस्तता के कारण अपने बच्चो पर ध्यान नही दे पाते है तो वे अपने बच्चो को वो हर सुविधा तो मुहैया करा देते है लेकिन भावनात्मक रूप से दूर हो जाते है जिनके कारण बच्चे इन्ही Mobile Smartphone में खो जाते है और आजकल इन्टरनेट के कारण तो Smartphone ही मनोरंजन के साथ साथ हर तरह की जानकारी का केंद्र बन गया है जिससे बच्चे लगातार इन्ही फोन में व्यस्त रहते है जिसके कारण अनेक प्रकार के दुष्प्रभाव बच्चो के सेहत पर देखने को मिलते है

1 – बच्चे यानि जब हम छोटे होते है तब इस अस्वस्था में बच्चो का दिमाग बहुत ही तेजी से विकसित होता है और मस्तिक विकास में आसपास के वातावरण और माहौल का प्रभाव दिमाग पर सीधा असर करता है यानि बच्चो के Mind विकास में बच्चे किसी प्रकार के मॉहौल अच्छे वातावरण Environmental Stimuli का प्रमुख योगदान होता है और जब बच्चे दिन रात इन्ही फोन में खो जाते है तो उनके दिमाग पर तरह तरह के Pressure के प्रभाव देखने को मिलते है

2 – जब भी किसी भी बच्चे के हाथ में Mobile Smartphone आ जाता है तो वह सबसे पहले फोन में गेम खेलना पसंद करता है और फिर विडियो देखना पसंद करता है लेकिन जब बच्चे के पास 24 घंटे मोबाइल रहने लगता है यही हमारे द्वारा दी गयी सुविधा बच्चो के लिए लत / Addiction बन जाती है जो की फिर बच्चा पढने लिखने और खेलने कूदने के बजाय अपने फोन में व्यस्त रहने लगता है जो की कहीं न कही यही बुरी आदत / Bad Habit  बच्चो के शारीरिक विकास को प्रभावित को प्रभावित करता है इससे आम बच्चे के मुकाबले Smartphone उपयोग करने वाले बच्चे का दिमाग तो विकसित हो सकता है लेकिन वे शारीरिक रूप से कमजोर होते जाते है

3 – Smartphone का सबसे बड़ा Side Effect बच्चो की आखो पर पड़ता है दिन के मुकाबले रात में जब बच्चे फोन के साथ Busy रहते है तो Smartphone से निकलने वाली प्रकाश का सीधा असर आखो पर पड़ता है जिसके कारण धीरे धीरे अत्यधिक फोन के उपयोग से बच्चो में आख की बीमारियों के होने का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है

4 – Smartphone से निकलने वाली रेडियो तरंगे और लगातार Smartphone उपयोग करने से फोन बहुत ज्यादा गर्म होने के कारण यही फोन हमारे सेहत पर सीधा असर डालती है अनेक वैग्निको के रिसर्च के अनुसार एक निश्चित समय तक फोन का उपयोग हो तो तब ठीक है लेकिन बहुत अधिक समय तक लगातार फोन उपयोग करने से दिल, दिमाग, आखो पर इसका सीधा असर पड़ता है

5 – जब बच्चे लगातार फोन उपयोग करते है तो उनके सोचने की क्षमता भी एक सिमित अवस्था तक ही रह जाती है अक्सर बच्चे Smartphone में Game को सबसे ज्यादा महत्व देते है और ये Game जो की बहुत ही आक्रामक और Competition Type के होते है जिससे बच्चे सोचते है वे हर गेम के Level पार कर लेंगे लेकिन इस स्थिति में बच्चे अपनी पढाई और खाना पीने पर ध्यान नही देते है जिससे यदि बच्चो को बीच में रोका जाय तो बच्चो के व्यव्हार में गुस्सा और आक्रामकता का भाव दिखाई देने लगता है

6 – अक्सर बच्चो की खुशी के लिए माता पिता अपने बच्चो को Smartphone तो दे देते है लेकिन उनका बच्चा क्या फोन के अलावा अपनी दिनचर्या को समय से पूरा करता है ये ध्यान नही रख पाते है जिससे बच्चो में भूख की कमी, असमय नीद  या देर रात तक नीद न आना जैसे कई प्रकार के दुष्प्रभाव बच्चो के सेहत पर देखने को मिलता है.

7 – Smartphone के उपयोग से बच्चा Technology में Expert तो हो सकता है लेकिन यही बच्चा धीरे धीरे फोन के अत्यधिक उपयोग से अपने समाज से किनारा करने लगता है जिससे बच्चो की समाज के प्रति समझ में धीरे धीरे कमी आने लगती है

बच्चो को मोबाइल के खतरों से बचाने के उपाय

यदि हम अपने बच्चो को खुशिया देने जानते है अगर अपने बच्चो पर थोडा ध्यान भी रखे तो निश्चित ही हम अपने बच्चो को भविष्य को अच्छा बना सकते है तो आईये जानते है बच्चो को कैसे मोबाइल स्मार्टफोन के होने वाले खतरों से कैसे बचाया जाय.

1 – जब हम सभी पहली बार अपने बच्चो को फोन देते है और बच्चे फोन चलाना शुरू करते है तो हम सभी को ये देखकर ख़ुशी प्राप्त होता है उनका बच्चा तो स्मार्ट है लेकिन जब हम बच्चो काम की अधिकता के कारण पर ध्यान नही दे पाते है तो यही हमारी छोटी सी गलती बच्चो के लिए बुरी आदत बन जाती है जिसका सीधा असर बच्चो की पढाई और सेहत पर पड़ता है इसलिए हम सभी को अपने बच्चो की दिनचर्या पर पूरी तरीके से ध्यान देना चाहिए और हमारा बच्चा क्या अधिक समय फोन गेम में व्यस्त रहता है तो उसे फोन के बजाय किताबो की ओर ज्यादा ध्यान देने के लिए केन्द्रित करना चाहिए

2 – दिन के मुकाबले रात में Smartphone से निकलने वाली प्रकाश की किरणे आखो पर सीधा असर डालती है इसलिए बच्चो को रात के अंधेरो में मोबाइल चलाने से दूर ही रखना चाहिए

3 – जब बच्चे अत्यधिक रूप से Smartphone से जुड़ जाते है तो इन फोन के बिना उन्हें कुछ भी अच्छा नही लगता है इस स्थिति में मारने डाटने के बजाय उन्हें थोडा खेलकूद और अन्य कामो में लगाना चाहिए जिससे बच्चा का ध्यान मोबाइल से दूर हो सकता है

4 – बच्चो को कभी भी झूठे वादे नही करना चाहिए अक्सर देखा जाता है की माता पिता अपने बच्चो से कहते है की तुम जल्दी से अपनी Homework और पढाई पूरी कर लेंगे तब उन्हें Smartphone चलाने के लिए मिल सकता है तो ऐसी स्थिति में बच्चो का सारा ध्यान Smartphone पर केन्द्रित हो जाता है जिससे बच्चे जल्दी से तो अपनी पढाई पूरी कर तो लेते है लेकिन बच्चो को फिर बाद में Smartphone न मिले तो बच्चो में माता पिता के प्रति नकरात्मक भावना का विकास होने लगता है और अंदर ही अंदर बच्चो का माता पिता के प्रति विश्वास कम होने लगता है इसलिए माता पिता को अपने बच्चो से ऐसे वादे करने से बचना चाहिए और यदि वादा कर भी देते हैएक निश्चित समय तक ही Smartphone अपने बच्चो को दे ऐसी कोशिश करनी चाहिए

5 – माता पिता को बच्चो को मोबाइल च्लानेको लेकर मारने पीटने से बचना चाहिए क्यूकी ऐसा करने से बच्चो में माता पिता के प्रति एक Negative Thinking का विकास होने होने लगता है इसकी अपेक्षा माता पिता को अपने बच्चो के साथ भावनात्मक रूप से जुड़कर उनके साथ समय बिताना चाहिए और उनके साथ बातचीत और खेलकूद में भाग लेना चाहिए जिससे बच्चो में माता पिता के प्रति प्यार के साथ आपसी विश्वास भी बढ़ता है

6 – कभी भी बच्चो को अकेले में मोबाइल फोन नही चलाना देना चाहिए हो सकता है की आपका बच्चा मोबाइल में इन्टरनेट उपयोग करते समय गलत वेबसाइट का शिकार हो सकता है ऐसे में आपका बच्चा अपने मोबाइल फोन में क्या क्या करता है इस बात का ध्यान जरुर रखना चाहिए और साथ में यदि बच्चे इन्टरनेट उपयोग करते हो हमे Browsing History भी चेक करते रहना चाहिए

7 – बच्चे दिल से बहुत ही कोमल होते है और उनपर किसी भी प्रकार की डाट फटकार उन्हें बहुत ही तोडती भी है जरुरी नही की आपका बच्चा हमेशा पढता ही रहे सो बच्चो को Smartphone से दूर करने के लिए उनके पढाई में साथ देना चाहिए और बच्चो को साथ पढाई में हमे समय जरुर बीतना चाहिए

बुधवार, 7 मार्च 2018

...तो इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं इरफ़ान खान !

...तो इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं इरफ़ान खान !


बॉलीवुड एक्टर इरफान खान को ब्रेन ट्यूमर के चलते कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से एक पोस्ट कर बताया था कि वो किसी गंभीर बीमारी से जूंझ रहे हैं। लेकिन अब सामने आ गया है कि वे ब्रेन ट्यूमर जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित हैं।

इरफान खान ब्रेन ट्यूमर की चौथी स्टेज पर है, जहां यह बीमारी और भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसके अलावा खबर यह भी है कि जल्द ही उनका ऑपरेशन किया जा सकता है। इरफान खान ने खुद सोमवार को एक ट्वीट करते हुए लिखा था कि पिछले 15 दिनों से उनकी जिंदगी खतरे में चल रही है। 

आइये जानते हैं की आखिर ब्रेन कैंसर क्या है?
ब्रेन कैंसर, कैंसर का वह रूप है जो मस्तिष्क (ब्रेन) से शुरू होता है। ब्रेन कैंसर मस्तिष्क की एक प्रकार की बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क के ऊतकों में कैंसर कोशिकाएं (घातक कोशिकाएं) पैदा होने लगती हैं। कैंसर की कोशिकाएं मस्तिष्क में ऊतकों के समूह या एक ट्यूमर के रूप में ऊभरती हैं, जो मस्तिष्क के कार्यों में बाधा उत्पन्न करती हैं। जैसे मांसपेशियों के नियंत्रण में परेशानी, सनसनी, यादाश्त और अन्य मस्तिष्क कार्यों को प्रभावित करना।

कैंसर जो मस्तिष्क में शुरू होता है उसको प्राइमरी ब्रेन ट्यूमर कहा जाता है। यह ट्यूमर मस्तिष्क की संरचना से जुड़े किसी भी भाग में विकसित हो सकता है। जो कैंसर शरीर के किसी अन्य भाग से मस्तिष्क में फैलता है, उसे सेकंडरी ब्रेन ट्यूमर या ब्रेन मेटास्टेस (Metastases) कहा जाता है। ब्रेन कैंसर ट्यूमर मस्तिष्क पर अधिक दबाव डालता है, जिससे या तो वह ऊतक नष्ट होने लग जाते हैं या शरीर के अन्य भागों में समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।

ब्रेन कैंसर के लक्षण व संकेत क्या होते हैं?
मेटास्टेटिक ब्रेन ट्यूमर के संकेत और लक्षण काफी सूक्ष्म हो सकते हैं, जिनका पता लगाने (खासकर पहली बार) में परेशानी हो सकती है। ये ट्यूमर अक्सर किसी दूसरी स्थिति की जांच के दौरान दिखाई देते हैं। इसके लक्षण विकसित होने का कारण यह होता है कि ब्रेन का ट्यूमर या तो मस्तिष्क पर दबाव डाल रहा होता है या फिर उसके किसी हिस्से को ठीक से काम करने से रोक रहा होता है।

इस दौरान मरीज क्या अनुभव कर रहा हैं? आम तौर पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि ट्यूमर कहां पर है और आकार में कितना बड़ा है।

संभावित लक्षण जिनमें शामिल हैं:
कभी-कभी मतली और उल्टी के साथ सिर दर्द - यह समस्या ट्यमर के कारण होती है जो आस-पास के ऊतकों को दबाकर खोपड़ी में दबाव बनाता है। आम तौर पर स्थिति सुबह के समय बद्तर होती है और दिन निकलने के साथ-साथ कम होती जाती है।

पूरे शरीर में या आंशिक रूप से दौरे पड़ना, मांसपेशियों में ऐंठन, असामान्य गंध या स्वाद, बोलने में समस्या या सुन्नता और झुनझुनी अनुभव करना।
बोलने, समझने और देखते में समस्या- ब्रेन में ट्यूमर मस्तिष्क के उस भाग को प्रभावित कर सकता है, जो इन क्षमताओं को नियंत्रित करते हैं।

शारीरिक कमजोरी और सुन्नता, यह तब होती है जब ट्यूमर मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करता है जो मांसपेशियों को नियंत्रित करते है। यदि ट्यूमर मस्तिष्क से मांसपेशियों तक जाने वाले सामान्य संकेतों के रास्ते में विकसित हो जाता है तो यह ब्रेन की कार्यगति (Brain motor fuctions) में परेशानी पैदा करता है।

ब्रेन कैंसर के साथ जुड़े अन्य लक्षण:
  • दौरे पड़ना,
  • संवेदी (स्पर्श) और ब्रेन की कार्यगति (मूवमेंट कंट्रोल) में कमी,
  • बहरापन,
  • उनींदापन या उंघना,
  • थकान,
  • समन्वय में कमी,
  • चेहरे पर कमजोरी का भाव,
  • दोहरा दिखाई देना,
  • डिप्रेशन (अवसाद),
व्यवहारिक और सोचने समझने की क्षमता में परिवर्तन।
उपरोक्त लक्षण ट्यूमर के प्रकार, आकार और उसकी जगह से जुड़े हो सकते हैं। इसके साथ ही साथ ये ब्रेन कैंसर को नियंत्रित करने के लिए उपचार में भी मदद करते हैं। सर्जरी, विकिरण (रेडिएशन), कीमोथेरेपी, और अन्य सभी प्रकार के उपचारों में नए लक्षण उत्पन्न करने की क्षमता होती है, क्योंकि ये ट्यूमर के प्रभाव को कम करने के लिए काम करते हैं।

ब्रेन कैंसर क्यों होता है?
यह निश्चित रूप से पता नही लगाया जा सका है कि अधिकतर ब्रेन कैंसर का क्या कारण है। लेकिन, कुछ ऐसे कारक हैं जो ब्रेन कैंसर के विकसित होने के जोखिम को बढ़ा देते हैं। विभिन्न प्रकार के कैंसर के विभिन्न जोखिम कारक हो सकते हैं:

लंबे समय तक किसी केमिकल या रेडिएशन के संपर्क में रहना ब्रेन कैंसर के विकसित होने का एक जोखिम कारक है। आम तौर पर लोग अपने कार्यस्थल आदि पर ऐसी चीजों के संपर्क में आते हैं। यह उन लोगों में अधिक आम होता है, जिन्होनें पहले कभी रेडियोथेरेपी, सीटी स्कैन या सिर का एक्स-रे आदि करवाया होता है। इनमें भी खासकर उनका, जिनका बचपन में कैंसर के लिए स्कैन या उपचार किया गया हो।

जिन लोगों को बचपन में कैंसर हुआ हो, उनमें बाद की जिंदगी में ब्रेन कैंसर विकसित होने के उच्च जोखिम होते हैं। जिन लोगों को वयस्क होने के बाद कभी ल्यूकेमिया हुआ हो, उनके लिए भी ब्रेन कैंसर के जोखिम बढ़ जाते हैं।
आनुवंशिक रूप से विरासत में मिली बीमारियां भी किसी व्यक्ति को ब्रेन ट्यूमर के लिए अतिसंवेदनशील बना सकती हैं। अगर किसी व्यक्ति के माता-पिता या भाई-बहन में से किसी को ब्रेन ट्यूमर है या था, तो उसके लिए सामान्य लोगों के मुकाबले जोखिम ज्यादा हो सकते हैं।

ब्रेन कैंसर किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ, ब्रेन कैंसर होने के जोखिम भी बढ़ते जाते हैं। लेकिन ब्रेन ट्यूमर के कुछ ऐसे प्रकार भी हैं, जो कम उम्र के लोगों के लिए ज्यादा आम होते हैं।
एचआईवी एड्स के से ग्रसित लोगों में आम लोगों की तुलना में ब्रेन ट्यूमर मिलने के अधिक जोखिम होते हैं। यह रोगप्रतिरोग क्षमता में कमजोरी से भी जुड़ा हो सकता है। (और पढ़ें - एचआईवी एड्स के लक्षण)

उपरोक्त जोखिम कारक होने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि इससे निश्चित रूप से ब्रेन कैंसर विकसित हो सकता है।

ब्रेन कैंसर की रोकथाम कैसे की जा सकती है?
ब्रेन कैंसर को रोकने का कोई तरीका नहीं है, हालांकि मस्तिष्क में फैलने वाले ट्यूमर का जल्दी निदान और उपचार मस्तिष्क में ट्यूमर विकसित होने के जोखिम को कम कर सकता है।
प्राइमरी ब्रेन कैंसर के जोखिम बनने वाले कुछ संभावित कारक जैसे सिर में विकिरण थेरेपी, एचआईवी संक्रमण और वातारण के विषाक्त पदार्थ भी हो सकते हैं। इसलिए इनके संपर्क में आने से बचने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव करने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, ब्रेन कैंसर के विकसित होने के विशेष कारणों के बारे में कोई नहीं जानता, खासकर प्राइमरी ब्रेन कैंसर के कारण को। इसलिए इसकी रोकथाम करने के किसी विशेष तरीके की जानकारी नहीं है।

ब्रेन कैंसर का परीक्षण कैसे किया जा सकता है?
अगर आपको ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, जो ब्रेन कैंसर का संदेह उत्पन्न करते है तो ऐसे में डॉक्टर आपका शारीरिक परीक्षण करेंगे और आपकी तथा आपके परिवार की पिछली स्वास्थ्य और मेडिकल स्थिति के बारे में पूछेंगे।

इसके तहत निम्नलिखित टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है:
 
न्यूरोलॉजिक (तंत्रिका संबंधी) परीक्षण – 
डॉक्टर आपके देखने व सुनने की शक्ति, मांसपेशियों में शक्ति, समन्वय और सजगता आदि की जांच करेंगे। डॉक्टर आंखों में सूजन की भी जांच करेंगे, जो मस्तिष्क में दबाव बढ़ने के कारण मस्तिष्क से आंखों को जोड़ने वाली नसों में दबाव आने के कारण आती है।

एमआरआई (MRI) – 
मस्तिष्क के ऊतकों में आए बदलावों के देखने के लिए एमआरआई से तस्वीरें ली जाती है। इसकी तस्वीरों में असामान्य जगहों को पहचाना जाता है, जैसे कि कोई ट्यूमर।

सीटी स्कैन (CT scan) – 
इसके इस्तेमाल भी मस्तिष्क में ट्यूमर जैसे असामान्य क्षेत्रों को देखने के लिए किया जाता है। (और पढ़ें - सीटी स्कैन क्या है)

एंजियोग्राम (Angiogram) – 
अगर मस्तिष्क में कैंसर है, तो उसे एंजियोग्राम की मदद से देखा जा सकता है।

बायोप्सी (Biopsy) – 
इसमें ट्यूमर की कोशिकाओ को देखने के लिए ऊतक का नमूना निकाला जाता है। बायोप्सी की मदद से ऊतकों के बदलाव जो कैंसर का कारण बन सकते हैं उनका एवं अन्य स्थितियों के बारे में पता लगाया जाता है। एक बायोप्सी मस्तिष्क कैंसर का निदान करने और उपचार की योजना तैयार करने का एकमात्र निश्चित तरीका है।

ब्रेन कैंसर का उपचार कैसे किया जाता है?
ब्रेन कैंसर का उपचार आम तौर पर कैंसर के प्रकार, आकार और स्थान पर निर्भर करता है। इसके साथ ही साथ आपके समग्र स्वास्थ्य और आपकी प्राथमिकताएं भी महत्वपू्र्ण भूमिका निभाती हैं।


1. सर्जरी (Surgery)-
अगर मस्तिष्क में ट्यूमर ऐसी जगह पर स्थित है, जहां पर ऑपरेश्न की मदद से पहुंचा जा सकता है, तो डॉक्टर ट्यूमर को जितना हो सके बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।
कुछ मामलों में ट्यूमर, छोटा और मस्तिष्क से आसानी से निकल जाने की दशा में होता है, जिससे सर्जरी के माध्यम से हटाना संभव होता है। वहीं, कुछ मामलों में ट्यूमर ऐसी दशा में होता है जिसको मस्तिष्क से अलग नहीं किया जा सकता या वह किसी संवेदनशील जगह के आस पास होता है, जिससे सर्जरी जोखिम भरी बन जाती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर उतना ही ट्यूमर हटाने की कोशिश करते हैं, जितना संभव हो पाता है।
ब्रेन कैंसर ट्यूमर से कुछ हिस्से को हटाने से भी ब्रेन कैंसर से संकेत व लक्षण कम हो जाते हैं।
सर्जरी द्वारा ब्रेन ट्यूमर को निकालने के साथ संक्रमण और खून बहने जैसे जोखिम होते हैं। अन्य लक्षण उस जगह पर निर्भर करते हैं, जहां पर ब्रेन ट्यूमर विकसित हुआ है। सर्जरी को चुनने से पहले उसके सभी जोखिमों के समझने के लिए डॉक्टर से बात करें।

2. रेडिएशन थेरेपी (Radiation therapy)
रेडिएशन थेरेपी में ट्यूमर ग्रसित कोशिकाओं को मारने के लिए एक्स-रे या प्रोटोन्स जैसी उच्च उर्जा की किरणों का इस्तेमाल किया जाता है। विकिरण चिकित्सा आपके शरीर के बाहर एक मशीन से आ सकती है, जिसे एक्सटर्नल बीम रेडिएशन कहा जाता है। बहुत ही कम मामलों में मशीन को शरीर के अंदर और मस्तिष्क के पास लगाया जाता है, जिसे ब्रैकीथेरेपी (Brachytherapy) कहा जाता है।
एक्सटर्नल बीम रेडिएशन सिर्फ उस जगह पर फोकस करती है, जहां पर ट्यूमर होता है। कई बार इसका फोकस पूरे मस्तिष्क पर लगा दिया जाता है, इसे पूर्ण मस्तिष्क पर विकिरण (Whole-brain radiation) कहा जाता है, इसका प्रयोग खासकर उस प्रकार के कैंसरों के इलाज के लिए किया जाता है जो शरीर के किसी अन्य हिस्से से मस्तिष्क में फैल जाते हैं।

3. कीमोथेरेपी (Chemotherapy) - 
कीमोथेरेपी में ट्यूमर ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए दवाओं का उपयोग किया जाता है। कीमोथेरेपी की दवा, खाने के लिए टेबलेट और नसों में इंजेक्शन के रूप में दी जाती है। कीमोथेरेपी की कई प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं, जिनका इस्तेमाल कैंसर के प्रकार के अनुसार किया जाता है।
कीमोथेरेपी की दवाओं के साइड इफेक्ट उसकी खुराक पर निर्भर करते हैं, इसके कारण बाल झड़ना, मतली और उल्टी जैसे समस्याएं हो सकती हैं।

4. टारगेटेड दवा थेरेपी (Targeted drug therapy)
लक्षित या टारगेटेड दवाओं द्वारा उपचार का मुख्य लक्ष्य उन विशेष असामान्यताओं पर होता है जो ब्रेन कैंसर के दौरान दिखाई देती हैं। इन असामान्यताओं को रोककर, कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।
इन दवाओं को नसों में इंजेक्शन के द्वारा लगाया जाता है, जिससे नई रक्त वाहिकाओं को बनने से रोका जाता है, ब्रेन कैंसर की कोशिकाओं में खून की सप्लाई को बंद कर दिया जाता है और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर दिया जाता है।

5. पैलीएटिव केयर (प्रशामक चिकित्सा; Palliative care)-
इस उपचार में मुख्य रूप से रोग के लक्षणों को कम करने, जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और रोगी तथा उसके परिवार वालों को सहारा देने पर ध्यान दिया जाता है। दर्दनिवारक उपचार व्यापक रूप से काफी भिन्न होते हैं, इनके साथ अक्सर दवाएं, पोषक तत्वों में बदलाव, आराम करने की तकनीक, भावनात्मक सहायता और अन्य प्रकार की थेरेपी शामिल होती हैं।

कोई भी व्यक्ति, अपनी उम्र, कैंसर के प्रकार या स्टेज की परवाह किए बिना दर्दनिवारक उपचार ले सकता है। यह और भी बेहतर काम करता है, जब यह उतना ही जल्दी शुरू की जाए जितना जल्दी उपचार की प्रक्रिया आवश्यक होती है। लोग एक ही समय में ट्यूमर के इलाज की दवाएं और साइड इफेक्ट को कम करने की दवाएं एक साथ ले सकते हैं। बल्कि, जो मरीज इन दोनों प्रकार की दवाओं को एक साथ लेते हैं, उनके लक्षण कम गंभीर होते हैं। जो मरीज इसप्रकार से अपना इलाज पाते हैं वे जीवन की बेहतर गुणवत्ता एवं उपचार संतुष्टि का अनुभव करते हैं।

6. उपचार के बाद पुनर्वास​ (Rehabilitation after treatment)
क्योंकि ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क के उन हिस्सों में विकसित हो सकता है जो मस्तिष्क की कार्यशीलता (मोटर स्किल्स), दृष्टि, बोलने और सोचने-समझने जैसे कार्यों को नियंत्रित करती है, इसलिए उपचार के बाद पुनर्वास की सुविधा स्वस्थ होने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। आपके डॉक्टर आपको उन सेवा प्रदाताओं के पास भेज सकते हैं, जो आपकी मदद कर सकती हैं, जैसे:

शारीरिक थेरेपी (Physical therapy) –
यह  मष्तिष्क के क्रियाशील रूप (मोटर स्किल्स )में आई हुई कमी या मांसपेशियों की ताकत को फिर से हासिल करने में मदद कर सकती है।
स्पीच थेरेपी (Speech therapy) –
यह विशेष रूप से ठीक बोलने में परेशानी महसूस करने वाले मरीजों की दी जाती है, जो मरीज को पहले की तरह बोलने की आदत व क्षमता को फिर से वापस पाने में मददगार होती हैं।

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

अगर पेशाब करने के बाद भी गिरती है दो चार बूंदे, 10 में से 3 लोगों को है ये जानलेवा बीमारी

अगर पेशाब करने के बाद भी गिरती है दो चार बूंदे, 10 में से 3 लोगों को है ये जानलेवा बीमारी


मनुष्य का शरीर इस दुनिया की सबसे अच्छी मशीन है. हमारा शरीर बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से काम करता है. हमारे शरीर का कोई अंग या चीज ऐसे ही नही है. हर चींज का कोई न कोई मतलब होता है. और सबसे बेहतर बात ये है कि हमारे शरीर में अगर कोई दिक्त आने वाली होती है तो उसका पहले से ही संकेत देने लगता है. हमारा शरीर कई तरह से संकेत देता है. शरीर किसी भी खराबी का संकेत अक्सर शरीर के मल-मूत्र से देता है. आज हम आप को वो संकेत बताने जा रहे को हमारा शरीर मूत्र के माध्यम से देता है.

यूँ तो हर व्यक्ति एक दिन में कई बार पेशाब करता है, जिस प्रकार पानी पीना और खाना हमारे जीवन के जरूरी हिस्से है वैसे ही पेशाब करना भी हमारे जीवन मे अत्यंत जरूरी है. आज हम आपको बताने जा रहे हैं की अगर किसी भी मनुष्य को पेशाब करने के बाद में दो चार बूंदे पेशाब बाद में हो जाती हैं तो ये किसी गंभीर बीमारी का लक्षण हैं, ये समस्या पुरुषों में कम बल्कि महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती हैं. ये समस्या दुनिया में 10 में से 3 लोगों को हैं.
महिलाओं के साथ अगर ऐसा हो रहा हैं तो ये खतरनाक बीमारी कैंसर का लक्षण हो सकता हैं, अगर ऐसा लगातार हो रहा है तो आपको डॉ से तुरंत परामर्श लेना चाहिए, आज हम आपको कुछ लक्षण के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे महिलाओं को नज़र अंदाज नहीं करना चाहिए, आइये जानते हैं इन लक्षणों के बारे में.. बार-बार पेशाब आना, नियमित रूप से पीरियड न होना, पेशाब करने के बाद दो चार बूंदे दोबारा आ जाना, पेट में दर्द और भारीपन रहना, गैस और दस्त लगना.
अदरख के चूरन के सेवन से ओवेरियन कैंसर का खतरा जड़ से खत्म हो जाता हैं, अजवायन के तेल का सेवन करने से भी कैंसर का खतरा कम होता हैं, अलसी भी कैंसर से लड़ने में गुणकारी होता हैं. महिलाओं को अलसी के तेल का भी खाने के साथ सेवन करना चाहिए..

सोमवार, 15 जनवरी 2018

कैंसर से लेकर मोटापे तक कई बिमारियों को खत्म करता है गुलाब

कैंसर से लेकर मोटापे तक कई बिमारियों को खत्म करता है गुलाब


प्यार को इजहार करने या फिर किसी रूठें को मनाने के लिए अगर किसी चीज का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है तो वह है, गुलाब। जी हां गुलाब वो प्यारा सा फूल है, जो शायद दो दिलो को जोड़नें के काम आता है, वैसे तो इसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता किसी को गिफ्ट देते समय ही आती है लेकिन क्या आपको पता है गुलाब के कई प्रकार के कार्य है जिनसे लोग अभी भी अनजान है। दुनिया भर में गुलाब की पत्तियों का उपयोग कई प्रकार की डिशेज बनाने में किया जाता है। इसके अलावा भी गुलाब की पत्तियां हेल्थ और शरीर के लिए भी काफी गुणकारी मानी जाती है। सुनकर चैंक गए ना ! लेकिन यह सत्य है। आज हम आपको गुलाब की पत्तियां के हेल्थ से जुड़ें हुए फायदों के बारें में बताने जा रहें है जिनके बारें में शायद आप भी वर्षो से अंजान रहें है.

आज की दुनिया में लोग सबसे ज्यादा मोटापे और उनसें जुड़ी हुई बिमारियों से परेशान है और ना जाने मोटापें को कम करने के लिए कितने ही प्रकार के उपयोग और प्रयोग करते रहते है। लेकिन क्या आपको पता है गुलाब से भी मोटापा कम किया जा सकता है !! दरअसल, गुलाब की पंखुड़ियों को रोजाना खाने से शरीर का मेटाबाॅलिज्म बढ़ता है जो शरीर के अंदर अनावश्यक चर्बी को नष्ट करने का कार्य करता है और इससे वजन कम करने में भी काफी मदद मिलती है।
इंसान सबसे ज्यादा अपने चेहरें से प्यार करता है खासतौर पर लड़कियां। आजकल सभी अपने चेहरें पर होने वालें पिंपल्स, दाग, झुर्रियों से बचना चाहते है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गुलाब कि पंखुड़ियों में इन सभी परेशानियों का इलाज छिपा हुआ है। गुलाब की पंखुड़ियों को रोजाना चेहरें पर मलने से बाॅडी में मौजुद टाॅक्सिंस दूर होते है। इससे चेहरें और स्किन से जुड़ी हुई कई बिमारियों को ठीक करने में मदद मिलती है।
कई लोग यूरिन यानि पेशाब से जुड़ी परेशानियों को नजरंदाज कर देते है। जिससे भी कई बड़ी बिमारियों का जन्म लेना स्वभाविक है, ऐसे में किसी को भी यूरिन से जुड़ी बिमारियों को हल्के में नही लेना चाहिए। वैसे अगर इंसान रोज या सप्ताह में कुछ दिन भी गुलाब की पत्तियों का सेवन करें तो वह यूरिन से जुड़ी परेशानियों से बच सकत है, क्योकि गुलाब की पंखु़ि़ड़यों में डाइयूरेटिक गुण मौजूद होते है, जो शरीर पेशाब का पीला होना, पेशाब के दौरान जलन होना जैसी बिमारियों से मदद करता है।
जरा सा भी ज्यादा खाने या फिर किसी भी प्रकार की अपच के कारण शरीर का डाइजेशन खराब हो जाता है। जिससे पाइल्स जैसी बिमारियों का जन्म होता है। लेकिन अगर व्यक्ति रोज कुछ गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करें तो वह डाइजेशन बिमारियों से तो बच ही सकता है इसके अलावा कब्ज और पाइल्स से भी अपना बचाव कर सकता है, क्योकि गुलाब की पंखुड़ियों में काफी मात्रा मे फाइबर पाया जाता है, जो इन रोगो को नष्ट करने में मदद करता है।

आजकल भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान अपने कामकाज के बोझ में ही दबकर रह जाता है और उसके शरीर की एनर्जी बिलकुल खत्म ही हो जाती है। लेकिन अगर इंसान अपनी एनर्जी को बरकरार रखना चाहता है तो उन्हें गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करना चाहिए। दरअसल, गुलाब की पत्तियों में विटामिन सी पाया जाता है, जिनके रोज खाने से शरीर को एनर्जी मिलती ही है और दिनभर इंसान को एक्टिव बनाए रखने में भी मदद करता है।

वैसे तो आप सभी को भी पता ही होगा कि कैंसर की बिमारी कितनी खतरनाक और जानलेवा है। कैंसर का इलाज संभव है और अगर इंसान अपने इलाज के साथ-साथ गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करें तो वह कैंसर के खतरे को कम कर सकता है। दरअसल, गुलाब की पंखुड़ियों में पाॅलीफेनाॅल्स होते है, जो कैंसर जैसी गंभीर बिमारियों से बचाने में मदद करती है।

चोट लगने पर शरीर पर होने वालें जख्म जल्दी नही भरते है लेकिन सिर्फ गुलाब की पंखुड़ियों के इस्तेमाल से आप भी जख्मों को जल्दी भर सकते है। क्योकि गुलाब की पंखुड़ियों में एंटीसेप्टिक गुण होते है जो घाव को जल्दी भरने में और ठीक करने में मददगार है।

गुलाब की पंखुड़ियां वैसे तो कई गुणों से भरपूर है लेकिन इसके साथ ही यह कई प्रकार की बिमारियों के बढनें और इन बिमारियों के इनफेक्शन को खत्म करने में भी मदद करता है। दरअसल, गुलाब की पंखुड़ियों को रोज खाने से बाॅडी की इम्यूनिटी बढ़ती है जो शरीर के अंदर के मौजूद किटाणुओं को नष्ट करने और कई प्रकार की बिमारियों से बचाने में इफेक्टिव है।

एक निश्चित आयु सीमा के बाद से इंसान के शरीर में बदलाव शुरू हो जाते है और फिर शरीर ज्यादा जटिल बन जाता है इसके साथ ही अगर ढलती उम्र का सबसे ज्यादा असर कहीं देखने को मिलता है तो वह है पैर के घुटनें। जी हां पैर के घुटनें के साथ-साथ शरीर के किसी भी जोड़ के दर्द को खत्म करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन गुलाब की पंखुड़ियों में एंटी इंफ्लंमेटरी की भरपूर मात्रा होती है तो जोड़ों के दर्द को ठीक करने में काफी मददगार है।

शहरों में बढ़तें प्रदुषण की मार के कारण सांस से जुड़ी हुई कई प्रकार की बिमारियां पैदा होती है। इससे अस्थमा तक होने का डर रहता है। ऐसे में इंसान को गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करना चाहिए क्योकि गुलाब की पंखुड़ियों में एंटी बैक्टिरियल तत्व मौजूद होते है जो सांस से जुड़ी हुई बिमारियों को खत्म करने और उनके इनफेक्शन से बचाने में काफी मदद करता है।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

इसकी सिर्फ 2 गोली करती है हर बीमारी का इलाज, एक बार जरूर ट्राय करे

इसकी सिर्फ 2 गोली करती है हर बीमारी का इलाज, एक बार जरूर ट्राय करे


किंग ऑफ स्पाइस या ब्लैक पेपर नाम से प्रचलित काली मिर्च भोजन में इस्तेमाल किए जाने वाले गर्म मसाले का अहम् हिस्सा है। काली मिर्च हमारे भोजन का स्वाद ही नहीं बढ़ाती, कई बीमारियों के इलाज में सहायक साबित होती है।

काली मिर्च, काला नमक भुना हुआ जीरा और अजवाईन को पीस कर लसी या निम्बू पानी में डाल कर पीने से पाचन किर्या दरुस्त रहती है| इस में केल्शियम , आइरन, फास्फोरस, कैरोटिन, थाईमन और रिथोफ्लेब्न जैसे पोष्टिक तत्व होते है | की गयी स्टडी के अनुसार काली मिर्च में बायो-एन्हंस्र नाम का रेसाइन होता है ,जिस की मौजूदगी में किसी भी दवाई का असर बढ़ जाता है तथा दवाई कम मात्रा में भी तेज असर करती है|

आवश्यक सामग्री :

  • 15 काली मिर्चे
  • 2 बादाम की गिरीयां
  • 5 मुनकें
  • 2 छोटी इलाइची
  • एक गुलाब का फूल
  • आधा चमच खसखस
  • 250 ग्राम दूध

बनाने की विधि:

15 काली मिर्चे, 2 बादाम की गिरीयां, 5 मुनकें, 2 छोटी इलाइची, एक गुलाब का फूल, आधा चमच खसखस को रात को एक वर्तन में डाल कर भिगो दे और सुबह को रगड़ कर 250 ग्राम दूध में मिला कर हर रोज लगातार कुछ महीने पीने से दिमाग में तरावट आयेगी और दिमाग की थकावट दूर हो जाएगी |

20 ग्रम काली मिर्च, 50 ग्राम बादाम 20 ग्राम तुलसी के पत्ते को एक साथ पीस कर चूरन या थोड़ा सा गुड़ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना ले और इस चूरन का एक चमच दो चमच या 2 गोलियां शहद में मिला कर चाटने से दिमाग की ताकत में सुधार होता है |

एक चमच घी और 8 काली मिर्च और शकर को मिला कर रोजाना चाटने से याद शक्ति में सुधार होता है तथा दिमाग की कम्जोरी दूर होती है

इसके फायदे:

ब्लड प्रेशर:  
ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने व शरीर को आराम देने में काली मिर्च बेहद फायदेमंद है। यदि आपका ब्लड प्रेशर बढ़ गया हो तो छोटी चम्मच काली मिर्च का पाउडर को आधे गिलास पानी में मिलाकर पीएं। आपका बीपी कंट्रोल होने लगेगा।


गैस या एसिडिटी:
पेट में गैस या एसिडिटी की समस्या होने पर आप तुंरत नींबू में काला नमक और काली मिर्च का पाउडर या 2 दाने मिलाकर इसका रस चूसें। यह आपकी अपच व गैस की समस्या को पल भर में दूर कर देगी।

गठिया:
जो लोग गठिया की समस्या से परेशान हैं वे तिल के गर्म तेल में काली मिर्च को डालकर उसे ठंडा कर लें और बाद में उस तेल से गठिया वाली जगह पर मालिश करें। एैसा करने से दर्द मे आराम मिलेगा।

पेट में कीड़े: 
यदि पेट में कीड़े की समस्या हो तो थोड़ी सी मात्रा में काली मिर्च के पाउडर को एक गिलास छाछ में घोलकर पी लें। दूसरा उपाय है किशमिश के साथ काली मिर्च दिन में तीन बारी खाएं।

कैंसर: 
हाल ही में कैंसर पर किए गए एक शोध में ये बात सामनेआई है कि महिलाओं के लिए कालीमिर्च का सेवन बहुत लाभकारी होता है। कालीमिर्च में विटामिन सी, विटामिन ए, फ्लैवोनॉयड्स, कारोटेन्स और अन्य एंटी -ऑक्सीडेंट आदि तत्व भी पाए जाते है। कालीमिर्च ब्रेस्ट कैंसर को रोकने में मददगार होती है। यह त्वचा के कैंसर से भी शरीर की रक्षा करती है।

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

कैंसर के पहले ही शरीर दे देता है आपको ये संकेत, कभी न करे नजरअंदाज

कैंसर के पहले ही शरीर दे देता है आपको ये संकेत, कभी न करे नजरअंदाज


कैंसर ऐसी चीज है जो हर किसी न किसी को डरा ही देती है और इससे डर होना भी लाजिमी है क्योंकि कैंसर किसी को मारता नही बल्कि तिल तिल कर मारता है और ऐसे में व्यक्ति न तो ठीक से जी पाता है और न ही मर पाता है लेकिन अगर कैंसर का ठीक शुरुआती अवस्था में पता लगा लिया जाए तो इसे जड़ से ही खत्म किया जा सकता है और आज हम आपको उसी के संकेत बताने जा रहे है तो चलिए फिर शुरू करते है।


आंत में दिक्कत 
अगर आपकी आंत में लगातार दिक्कत बनी रहती है और आप को डायरिया और अपच की शिकायत भी एक नही कई बार होती है तो ये आंतो में कैंसर का लक्षण हो सकता है।
मूत्र में खून
अगर आपके मूत्र में लगातार खून आने लगा है तो ये भी कैंसर हो सकता है हालाँकि कई केसेज में ये किडनी स्टोन भी निकल आता है लेकिन आपको एक बार चेक अप तो जरुर करवाना ही चाहिए।

वजन कम होना
अगर आपका वजन अचानक से ही जरूरत से ज्यादा कम होने लगा है तो ये आपके अन्दर कैंसर का एक बड़ा ही प्रभावकारी कारक माना जा सकता है हालाँकि कुछ लोग इसे हलके में ले लेते है जो कभी भी नही लेना चाहिए।

पीठ में काफी दर्द रहना
वैसे तो सामान्य तौर पर किसी की भी पीठ में दर्द हो सकता है इसमें कोई गुंजाइश नही है लेकिन अगर आपकी पीठ में काफी हद तक महसूस होने लगा है कि पीठ का दर्द है और वो आये दिन होता रहता है बिना किसी वजह के है और दवाई लेने के बाद ठीक तो हो जाता है लेकिन कुछ समय बाद फिर से हो जाता है तो इसका मतलब है आपको ये आगे चलकर केंसर जैसी दिक्कत दे सकता है।
ये भी पढ़िए : कैंसर की प्रारंभिक चेतावनी देने वाले प्रमुख संकेतों की जानकारी

अत्यधिक थकान
अगर ऊपर वाले किसी भी लक्ष्ण के साथ ही साथ आपको काफी ज्यादा थकान महसूस होने लगी है तो इसका मतलब है कि आपके अन्दर लक्षण काफी प्रभावी है।

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

दिन में चार चम्मच और कैंसर गायब ! रूस के मशहूर वैज्ञानिक ने बनाई एक शक्तिशाली औषधि.!!

दिन में चार चम्मच और कैंसर गायब ! रूस के मशहूर वैज्ञानिक ने बनाई एक शक्तिशाली औषधि.!!


दुनिया भर के अरबों लोग कैंसर से पीड़ित हैं, आज के समय की यह सबसे घातक बीमारी है। लेकिन कुछ लोगों का दावा है कि यह रूसी वैज्ञानिक Hristo Mermerski द्वारा की खोजे एक प्राकृतिक उपचार से ठीक किया जा सकता है। रूस के एक वैज्ञानिक Hristo Mermerski ने घर में बनाई जाने वाली एक इसी औषधि इजाद की है जिस के इस्तेमाल से बहुत सी भिन्न भिन्न प्रकार की बीमारियो अथवा कैंसर जैसे जानलेवा बीमारी से भी बचा जा सकता है | ये औषधि कई प्रकार के कैंसर के इलाज में फायदेमंद हो सकती है

औषधि तैयार करने की सामग्री :

  • 400 ग्राम ताज़ा अखरोट
  • 400 ग्राम अंकुरित अनाज गेंहू (sprouted grains )
  • 1 किलो प्राकृतिक शहद
  • 12 ताज़ा लहसुन की कलियाँ
  • 15 ताज़ा निम्बू

अंकुरित अनाज (sprouted grains) तैयार करने का तरीका –

अनाज को एक कांच के बर्तन में रख दे उस में उतना पानी डालें जिस से अनाज अच्छी तरह भीग जाए | इसे एक रात के लिए इसी तरह छोड़ दें अगली सुबह अनाज को निकाल कर छान पानी निकाल दें अच्छी तरह पानी से धोने के बाद अनाज में से सारा पानी निकल दें | पानी निकालने के बाद अनाज को दोबारा कांच के बर्तन में ढाल कर 24 घंटे तक रखें | इस से अंकुरित अनाज तयार हो जायेगा |
ये भी पढ़िए : 

औषधि तैयार करने का तरीका –

  • लहसुन की कलियाँ , अखरोट और अंकुरित अनाज को ले कर एक साथ पीस लें |
  • 5 निम्बू लेकर बिना छिलका उतारे पीस लें
  • बाकि के 10 निम्बुओ का रस निकाल कर मिश्रण में मिला लें
  • सभी चीज़ों को अच्छे से मिला लें
  • अब इस मिश्रण में शहद मिलाये इसे मिलाने के लिए लकडी के चम्मच का इस्तेमाल करें
  • इस मिश्रण को एक कांच के बर्तन में भर लें और फ्रिज (fridge) में रख दें| इसे तीन दिन के लिए फ्रिज में रखें और आगे बताए अनुसार इसका सेवन करें :
इसे सोने से आधा घंटा पहले लें और हर बार खाना खाने से आधा घंटा पहले लें | अगर आप इस औषधि का इस्तेमाल कैंसर के इलाज के लिए कर रहें हों तो हर 2 घंटे में 1 – 2 चमच लें |

ये औषधि लम्बी उम्र और स्वस्थ जीवन के लिए सहायक है | ये कैंसर के इलाज में बहुत लाभकारी है और साथ ही जवान दिखने और शारीरिक ताकत के लिए भी फायदेमंद है | ये शरीर में मेटाबोलिज्म को बढाता है, गुर्दों और लीवर को साफ़ करता है, शरीर में बिमारिओं से लरने की शक्ति पैदा करता है और दिल के दौरे से बचाता है| अगर आपको ये जानकारी लाभकारी लगे तो इसके बारे में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बताना ना भूलें |

शनिवार, 18 नवंबर 2017

त्वचा पर ना बनवाएं टैटू, इससे लाभ की जगह हो सकती है हानि

त्वचा पर ना बनवाएं टैटू, इससे लाभ की जगह हो सकती है हानि


आजकल टैटू का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है पर बिना विचार किये इसे बनाने से आप संकट में भी फंस सकते हैं।टैटू का हमारे शरीर पर, मन पर और जीवन पर सीधा असर पड़ता है, खासकर उन टैटू का जो कि किसी आकृति के रूप में होते हैं। यानी यदि आप ने अपने शरीर में कोई आकृति बनवाई है तो उसका प्रभाव आपके मन, शरीर और व्यवहार में आना तय है।

टैटू बनवाना आजकल काफी ट्रेंड में है। आज के युवाओं के लिए यह स्टाइल स्टेटमेंट बन गया है। शरीर के लगभग हर भाग में टैटू बनाना आजकल युवाओं में काफी कॉमन हो गया है, लेकिन इनसे होने वाली परेशानियों के बारे में आज तक आपको नहीं पता होगा। तो आइए आपको बताते हैं कि टैटू बनवाने से किस तरह की परेशानियां सामने आती हैं।

त्वचा से जुड़ी परेशानियां
टैटू आजकल लगभग हर कोई बना रहा है, लेकिन इस तरह के टैटू से कई तरह की गंभीर समस्या आपके सामने आ सकती है। इससे त्वचा में लालिमा, मवाद, सूजन जैसी कई तरह की परेशानियां सामने आ सकती हैं। इसके अलावा कई तरह के बैक्टीरियल संक्रमण भी आपको इनसे हो सकते हैं। पर्मानेंट टैटू के दर्द से बचने के लिए कई लोग नकली टैटू का सहारा लेते हैं, लेकिन ऐसा ना करें। इससे आपको और भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
कैंसर और त्वचा संबंधित रोग
टैटू बनाते समय हम एक बार भी नहीं सोचते। आपको बता दें कि इससे सोराइसिस नाम की बीमारी होने का डर रहता है। एक इंसान पर इस्तेमाल की गई सुई का दूसरे इंसान पर इस्तेमाल करने से त्वचा संबंधित रोग, एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। टैटू बनवाने से कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है।
ये भी पढ़िए : कैंसर सम्बन्धी 

जहरीले तत्वों का खतरा
टैटू बनाने के लिए एक अलग तरह की स्याही का इस्तेमाल किया जाता है, जो कि हमारी त्वचा के लिए काफी खतरनाक होती है। टैटू बनाने के लिए नीले रंग की स्याही का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें एल्यूमिनियम और कोबाल्ट होता है। नीले रंग के अलावा और रंगों में कैडियम, क्रोमियम, निकल व टाइटेनियम जैसी कई धातुएं मिली रहती हैं, जो कि त्वचा के लिए खराब होती हैं।

मांसपेशियों को नुकसान
कई बार आज के युवा अपनी त्वचा पर बड़े शौक से टैटू बनवा तो लेते हैं, लेकिन उसके बाद होने वाले नुकसान से अंजान रहते हैं। कुछ डिजाइन ऐसे होते हैं जिनमें  सूइयों को शरीर में गहराई तक चुभाया जाता है। जिसके चलते मांसपेशियों को काफी नुकसान पहुंचता है। विशेषज्ञों की मानें तो लोगों को शरीर के तिल वाले हिस्से पर टैटू बिल्कुल नहीं बनवाना चाहिए।

सावधानी बरतना है जरूरी
आपको जानकारी के लिए बता दें कि टैटू बनवाने से पहले लोगों को हेपेटाइटिस बी का टीका लगवा लेना  चाहिए। इसके अलावा आपको किसी स्पेशलिस्ट से ही टैटू बनवाना चाहिए जो इस कला में माहिर हो। स्पेशलिस्ट उपकरण और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं। जिस जगह पर टैटू बनवाएं वहां पर रोजाना एंटीबायोटिक क्रीम जरूर लगाते रहें।
खाली पेट खाएं अंगूर, इन बीमारियों से रहेंगे हमेशा दूर

खाली पेट खाएं अंगूर, इन बीमारियों से रहेंगे हमेशा दूर


अंगूर का सेवन बहुत से लोग करते है। भले ही अंगूर टेस्ट में मीठा हो लेकिन इसमें शुगर की बिल्कुल भी मात्रा नहीं होती है। अंगूर में सभी जरूरी पोषक तत्व जैसे जल, सोडियम, पोटेशियम, साइट्रिक एसिड, मैगनेशियम और आयरन मौजूद होते है जो शरीर को कई बीमारियों से बचाकर रखते है। अगर अंगूर का सेवन सुबह खाली पेट किया जाए तो ज्यादा फायदा मिलता है। हम आपको कुछ ऐसे बीमारियों के बारे में बताएंगे, जिनमें अंगूर का सेवन काफी फायदेमंद होता है।
ये भी पढ़िए : माइग्रेन से बचने के लिए घरेलु उपाय


माइग्रेन का दर्द :
माइग्रेन एक ऐसी बीमारी है, जिसमें सिर का आधा हिस्सा दर्द करने लगता है। अंगूर का जूस माइग्रेन का दर्द दूर करने में सहायक है। इसके अलावा माइग्रेन के दर्द में अंगूर का सेवन करने से भी राहत मिलती है।

एनीमिया :
जब शरीर में खून की कमी हो जाए तो उसे एनीमिया कहते है। एनीमिया का बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अंगूर सबसे अच्छा तरीका है। रोजाना खाली पेट अंगूर का सेवन करें। इससे काफी फायदा मिलेगा।
हार्ट अटैक :
हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों में भी अंगूर काफी फायदेमंद है। अंगूर का फल हार्ट अटैक के मरीज के लिए एसप्रिन की गोली की तरह काम करता है क्योंकि एसप्रिन की गोली शरीर में खून के थक्के जमने नहीं देती जिससे हार्ट ठीक रहता है। अगर आप भी हार्ट अटैक के मरीज है तो काले अंगूर का रस पिएं। 

कैंसर :
अंगूर में पॉली-फेनोलिक फाइटोकेमिकल मौजूद होते है जो शरीर को न केवल कैंसर से, बल्कि कोरोनरी हार्ट डिजीज, नर्व डिजीज, अल्जाइमर और फंगल इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं।

रक्तस्राव के बाद क्षतिपूर्ति :
शरीर के किसी भी भाग से जब ज्यादजा खून वह जाए तो अंगूर के एक गिलास जूस में दो चम्मच शहद मिलाकर पिएं। इससे रक्त की क्षतिपूर्ति हो जाएगी। 

फोड़े-फुंसियों और मुंहासों से राहत :
अंगूर फोड़े-फुंसियों और मुहासों को सुखाने में सहायक होता है। अंगूर के रस के गरारे करने से मुंह के घावों और छाले भी दूर हो जाते है।

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

‘कैंसर’ होने से पहले शरीर देता है ये संकेत, समय रहते करें ये उपचार

‘कैंसर’ होने से पहले शरीर देता है ये संकेत, समय रहते करें ये उपचार


पूरी दुनिया में कैंसर ही एक ऐसी बीमारी है। जिससे सबसे ज्यादा लोगों की मौत होती है। कैंसर का आज तक कोई ऐसा इलाज नहीं मिला जिससे इसे जड़ से खत्म किया जा सकें। शुरू में तो कैंसर होने पर लोगों को पता ही नहीं चलता। इसका एहसास तब होता है जब यह ज्यादा बढ़ जाता है। लेकिन अगर कैंसर का पता शुरू में ही चल जाये तो कुछ इलाज करके इसके रोगी की जान बचाई जा सकती है।

क्या आप जानते है की हमारा शरीर उस मे किसी भी तरह की गड़बड़ होते ही आपको अलग अलग तरह के संकेत देने लगता है जिन से हमें ये पता चल जाता है की शरीर में कुछ गड़बड़ है। ठीक उसी तरह कैंसर होने पर भी हमारा शरीर पहले ही हमें संकेत देने लगता है। अगर हमें उनका पता चल जाये तो हम शुरू में ही इसका इलाज करवा सकते है तो अपनी जिंदगी को बचा सकते है। आज हम वही संकेत आपको बताने जा रहे है जो शरीर कैंसर होने पर हमें देने लगता है। यह संकेत कुछ इस प्रकार है।
लगातार खून बहना :-
शरीर से खून का अधिक बहना जैसे मल करते समय मल के साथ लगातार खून आना या मूत्र के साथ खून आना यह संकेत देता है की शरीर में कैंसर पैदा हो रहा है। इसीलिए अगर आपको भी लगातार खून बहने की समस्या आ रही है तो डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए। क्योंकि ये लक्षण कैंसर के होते है।
रात को अधिक पसीने आना :-
अधिक गर्म खाना खाने व दवाई का अधिक सेवन करने के कारण रात में सोते समय शरीर से पसीने निकलते है। लेकिन अगर आपको इनके बिना भी अधिक पसीने आते है तो इसका कारण शरीर में कैंसर भी हो सकता है। इसीलिए अगर आपको भी अधिक पसीने आने की समस्या है तो डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।
अचानक तेजी से वजन कम होना :-
अगर आपका भी वजन बिना किसी कारण के अचानक से कम होने लगता है तो ये कोई साधारण बात नहीं है। ऐसा होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए क्योंकि ऐसा कैंसर के रोगी को होता है। इसीलिए बिना समय बर्बाद किये डॉक्टर से कैंसर की जाँच जरूर करवानी चाहिए।

अगर आपको भी इनमें से कोई संकेत देखने को मिले तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

शनिवार, 4 नवंबर 2017

इमली के इतने सारे फ़ायदे जानकार हैरान रह जायेंगे आप

इमली के इतने सारे फ़ायदे जानकार हैरान रह जायेंगे आप


खट्टा मिठ्ठा स्वाद होने के कारण इमली का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है। इसका इस्तेमाल खाना बनाने, पानीपुरी का पानी और चटनी आदि बनाने के लिए किया जाता है। इमली खाना बनाने के ही नहीं बल्कि सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है। इसमें मौजूद आयरन,फाइबर,मैगनीज,कैल्शियम,फॉस्फोरस से कई तरह की बीमारियां दूर रहती है। तो आइए जानते है रोजाना इमली के गुण किस तरह से शरीर को क्या-क्या फायदे दे सकते है।

कैंसर के लिए फायदेमंद :-
पानी में 2-3 इमली को कुछ देर भिगो दें और रोजाना सुबह इसका सेवन करें। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और टारटरिक एसिड भरपूर मात्रा में होते है। जिससे शरीर में कैंसर सेल्स नहीं बढ़ते और कैंसर जैसी बीमारी दूर रहती है।
बुखार में असरदार :-
बुखार ग्रस्त रोगी को 15 ग्राम इमली के फल का रस देने से फिवर जल्दी उतर जाता है। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन ई, बी, सी इम्यून सिस्टम को ठीक रखते है। जिससे पेट से जुड़ी समस्याए नहीं होती।
गले की खराश में लाभकारी :-
इमली की पत्तियों का रस निकालकर पीने पर गले की खराश से राहत मिलती है इस प्रयोग को गले में टॉन्सिल होने की दशा में नही करना चाहिये क्योंकि कई बार इमली गले में टॉन्सिल की समस्या को बढ़ा देती है ।

चेहरे को सलोना बनाने के लिये :-
इमली और साबुत हल्दी को पानी में भिगो कर इसका पेस्ट बना लें। कर इसका पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को नियमित रुप से चेहरे पर लगाने से सांवलापन दूर होता है।
मोटापे से छुटकारा पाने के लिये :-
रोजाना सुबह एक इमली खाने पर मोटापा दूर होता है। इसमें मौजूद हाइड्रोसिट्रिक शरीर में बनने वाले फैट को धीरे-धीरे कम करते है। इसके साथ ही इसमें आयरन और पोटेशियम होते है जो ब्लड प्रैशर को कंट्रोल में रखते है।

डायबिटीज करे कंट्रोल :-
एक छोटा गिलास इमली का जूस पीने से शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है। यह शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स को इकट्ठा नहीं होने देती। जिससे शुगर लेवल नहीं बिगड़ता। इसके अलावा इमली रेड ब्लड सेल्स बनाने में भी मदद करती है।

इमली के गुण की भरपूर जानकारी वाला यह लेख आपको अच्छा और लाभकारी लगा हो तो कृपया लाईक और शेयर जरूर कीजियेगा । आपके एक शेयर से ही किसी जरूरतमंद तक सही जानकारी पहुँचती है और हमको भी आपके लिये और बेहतर लेख लिखने की प्रेरणा मिलती है । इस लेख के समबन्ध में आपके कुछ सुझाव हों तो कृपया कमेण्ट के माध्यम से हमको जरूर सूचित करें ।

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

गले के कैंसर कहीं आपको भी तो नही, समय रहते बचाएं जान

गले के कैंसर कहीं आपको भी तो नही, समय रहते बचाएं जान


कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका पता इतनी आसानी से नहीं चल पाता। अन्य प्रकार के कैंसर की बजाय, गले के कैंसर को गले की आम समस्या के तौर पर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है और जब तक रोग की पहचान होती है  स्थिति गम्भीर हो चुकी होती है। ऐसे में जरूरी है कि समय रहते ही इसके लक्षणों को पहचाना जाए और उचित उपचार किया जाए। आज हम आपकों गलें के कैंसर के शुरूआती लक्षणों को बारें मे बता रहे हैं जिससे कि प्रारम्भिक अवस्था में ही आप इस गम्भीर बीमारी के संकेत आसानी से समझ सकते हैं।

निगलने में तकलीफ
यह गले के कैंसर का अहम संकेत है। गले में तकलीफ होने पर लोग आमतौर पर नर्म खाना खाने की कोशिश करतेहैं जो सही नहीं है। ऐसी कोई समस्या होने पर डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।

आवाज में भारीपन आना
गले के कैंसर के रोगियों को लंबे समय तक गले का बैठ जाना, आवाज़ में बदलाव आ जाना जैसे लक्षण नज़र आते हैं।
कान, गले और सिर में दर्द
अगर लम्बे समय से आपके गलें,कान और सिर में दर्द बना रह रहा है तो इसे भूलकर भी नजरअंदाज ना करें क्योंकि ये गलें के कैंसर का प्रारम्भिक लक्षण हैं …कैंसर में गले की ग्रंथियां सूज जाती हैं और दर्द करने लगती हैं।
कफ या गले में खिचखिच
अगर गले में काफी लंबे समय से खराश की समस्या बनी रहती है और खांसने पर खून भी आता है तो सावधानी बरते। जरूरी नहीं है कि यह कैंसर ही हो लेकिन ज्यादा देर तक कफ बना रहे तो सावधानी बरते।
लगातार खांसी आना
आमतौर पर खांसी को लोग हल्के में लेते हैं लेकिन अगर किसी को लम्बें समय से खांसी आ रही है तो ये गले के कैंसर का भी संकेत हो सकता है। साथ ही अगर बलगम के साथ रक्त भी आने लगता है तो जल्द ही जांच करानी चाहिए।

तेजी से वजन कम होना
वयस्कों का वजन आसानी से नहीं घटता लेकिन अगर आप बिना किसी कोशिश के दुबले होते जा रहे हैं तो जरूर ध्यान देने की बात है। ये थॉयरायड का लक्षण है और थॉयरायड का अगर सही युपचार नही किया जाए तो ये गले के कैंसर में बदल सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को खुद में या परिवार के किसी सदस्य में इस तरह की समस्याएं नजर आ रही हैं, तो उसकी जाँच आवश्यक होती है। खास तौर पर, यदि यह लक्षण दो से तीन हफ़्तों से ज्यादा तक रहते हों। इस कैंसर की शुरुआती पहचान और जाँच बेहद ज़रुरी होती है, क्योंकि जब तक यह गले के बाद शरीर के बाकी हिस्सों तक नहीं फैलता इसे सर्जरी से हटाया जा सकता है। लेकिन यदि यह ज्यादा फैल जाए तो इसका उपचार बेहद मुश्किल हो जाता है।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

जानिए ये हैं ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण, समय पर जांच बचाएगी आपकी जान

जानिए ये हैं ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण, समय पर जांच बचाएगी आपकी जान


कैंसर एक जानलेवा बीमारी है। साल दर साल इसके मरीज तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। ICMR के आंकड़ों के अनुसार देश में 2020 तक कैंसर के 17.3 लाख नए मामले सामने आने की आशंका है। इनमें भी स्तन,फेफड़े और सर्विक्स कैंसर के मामले टॉप पर रहेंगे।


रिपोर्ट के अनुसार 2016 में सबसे ज्यादा मरीज स्तन कैंसर के थे। इनकी संख्या तकरीबन 1.5 लाख थी। कैंसर के बारे में एक सकारात्मक तथ्य यह है कि यदि समय रहते बीमारी का पता चल जाए तो इसका उपचार भी किया जा सकता है। ऐसा ही कुछ स्तन कैंसर के साथ भी है।

हमारे सामने आम महिलाओं के अलावा कुछ सेलिब्रिटीज के उदाहरण भी सामने हैं जिन्होंने ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ जंग जीतकर एक नई जिंदगी शुरू की है। हालांकि बावजूद इसके महिलाओं में इस बीमारी को लेकर जागरूकता का स्तर बेहद कम है।

तो फिर देर किस बात की है। आइए जानते हैं पूरी बात। इसी बहाने आप लोगों की भी मदद हो जाएगी।

लक्षण 1

स्तन कैंसर का सबसे आम लक्षण स्तन पर गांठ आदि का बनना होता है। दर्दरहित, कठोर और बेढंगी सी गाठ कैंसर का संकेत होती है। कुछ मामलों में यह गांठ दर्दनाक, सॉफ्ट और गोलाकार भी हो सकती है।

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लक्षण 2

यदि स्तन पर कोई नई गांठ न हो लेकिन स्तन पर या इसके किसी हिस्से पर सूजन आ रही हो तो यह चिंता का विषय हो सकता है।

लक्षण 3

यदि त्वचा पर इर्रिटेशन हो रहा हो या स्तन पर कुछ निशान बन रहे हो तो यह भी स्तन कैंसर की निशानी हो सकती है।


लक्षण 4

यदि आपको निपल या स्तन के किसी भाग में दर्द हो रहा है तो आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसकी जांच करा लेना ही बेहतर होता है।

लक्षण 5

'निपल रिट्रैक्शन' एक स्थिति होती है, जिसमें निपल का कोना बाहर निकलने की बजाए अंदर धंस जाता है। ऐसी स्थिति में भी कैंसर की आशंका बनी रहती है।

लक्षण 6

स्तन या निपल की त्वचा लाल या मोटी हो रही हो या उसकी परत निकल रही हो तो इस पर नजर रखें। साथ ही समस्या बनी रहने पर डॉक्टर से संपर्क करें।

लक्षण 7

स्तन से दूध का निकलना तो आम बात है। मगर निपल से किसी और तरह का भी डिस्चार्ज हो रहा है तो इसे गंभीरता से लें।
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लक्षण 8 

स्तन कैंसर के मामले में गांठ या उभार हमेशा स्तन पर ही नहीं होता है। कभी-कभी स्तन से पहले गठान बांहों के नीचे या कॉलर बोन के आस-पास भी हो सकती है। 

लक्षण 9

स्तन कैंसर के कुछ मामलों में स्तन पर एग्जिमा की तरह लाल चकते भी पड़ जाते हैं। ऐसा Paget's disease नाम के रेयर कैंसर में होता है।
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जांच जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक इन लक्षणों पर तो नजर रखी ही जानी चाहिए। नियमित रूप से मैमोग्राफी और अन्य स्क्रीनिंग टेस्ट्स कराना भी बेहद आवश्यक होता है।

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

आज ही कर लें गुटखा से तौबा, कैंसर के साथ मर्दानगी पर है खतरा

आज ही कर लें गुटखा से तौबा, कैंसर के साथ मर्दानगी पर है खतरा


पान मसाला, तंबाकू, धूम्रपान और इसी तरह की कितनी ही चीजों के आदि होते जा रहे हैं कुछ लोग तो गुटखा और पान मसाला खाना शान की बात समझते हैं। विज्ञापन की दुनिया में इनके कई लुभावने प्रचार दिखाए जातें हैं जानेमाने अभिनेता और कलाकार इनका खुलकर प्रचार करते हैं और नतीजन आम जनता भी शौक में इसकी आदी बन जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसा करके आप खुद को ही कुएं में डाल रहे हैं यानी ऐसा करने से आप बीमारियों को खुद बुलावा दे रहे हैं।

अब तो शोधों में भी ये बात साबित हो चुकी है कि गुटखा व इसी तरह की अन्य चीजों के सेवन से शरीर के विभिन्न अंगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं इनका प्रभाव कई बार इतना खतरनाक होता है कि आपको कैंसर तक हो सकता है सिर्फ बीमारियां ही नहीं इनसे व्याक्ति का हार्मोंन संतुलन भी बिगड़ने लगता है और सेक्स हार्मोंस भी प्रभावित होते हैं।
कैंसर की सबसे बड़ी वजह
दुनियाभर के देशों में भारत के लोगों को मुंह का कैंसर व अन्य तरह के कैंसर का सबसे अधिक खतरा रहता है इसका सबसे बड़ा कारण भारतीयों द्वारा गुटखा अधिक से अधिक प्रयोग। दरअसल गुटखे में मिलाया जाने वाला तंबाकू, सुपारी, चूना, नशीले पदार्थ और कत्था इत्यादि से शरीर के एंजाइम्स पर बहुत बुरा असर पड़ता है इससे शरीर के हर हिस्से में पाए जाने वाले इन एंजाइम्स की कार्यशैली और कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मर्दानगी के लिए है खतरा
शरीर में मौजूद एंजाइम्स हार्मोंस के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ऐसे में एंजाइम्स को सेक्स हार्मोंस को बनाने में उस समय दिक्क‍तें आने लगती हैं जब गुटके के प्रभाव से एंजाइम्स की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। इतना ही नहीं गुटखे के कारण शरीर में मौजूद टॉक्सिन की प्रक्रिया भी बाधा होती है क्योंकि गुटके से टॉक्सिन बनाने वाले हार्मोंस की प्रक्रिया में भी बाधा होने लगती है। मतलब गुटखा खाने से डायरेक्ट और इनडायरेक्ट सेक्स हार्मोंस बहुत प्रभावित होते है इतना ही नहीं जो पुरूष बहुत अधिक गुटखे का सेवन करने लगते हैं या लगातार गुटका खाने लगते हैं उनके नंपुसक होने की संभावना दुगुनी हो जाती है।
डीएनए पर पड़ता है घातक प्रभाव
गुटका, तंबाकू, पान इत्यादि खाने से इसीलिए भी बचना चाहिए क्योंकि इनके निर्माण में कई तरह के रसायन और खुशबुदार कलर्स का इस्तेमाल होता है जिससे आपके हार्मोंस तो प्रभावित होते ही हैं साथ ही आपके डीएनए को भी नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है।
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रविवार, 15 अक्तूबर 2017

वो बातें जो डाक्टर नहीं बताता रोगी को पर आपके लिए जानना है आवश्यक

वो बातें जो डाक्टर नहीं बताता रोगी को पर आपके लिए जानना है आवश्यक


वो बारह बातें जो डाक्टर नहीं बताता रोगी को पर आपके लिए जानना है आवश्यक*

1. दवाइयों से डायबिटीज बढ़ती है अक्सर डायबिटीज शरीर में इंसुलिन की कमी होने से पैदा होती है। लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि कुछ खास दवाईयों के असर से भी शरीर में डायबिटीज होती है। इन दवाइयों में मुख्यतया एंटी डिप्रेसेंट्स, नींद की दवाईयां, कफ सिरफ तथा बच्चों को एडीएचडी (अतिसक्रियता) के लिए दी जाने वाली दवाईयां शामिल हैं। इन्हें दिए जाने से शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है और व्यक्ति को मधुमेह का इलाज करवाना पड़ता है।


2. बिना वजह लगाई जाती है कुछ वैक्सीन लोगों को किसी बीमारी के इलाज के लिए लगाई जाती है। परन्तु कुछ वैक्सीन्स ऎसी हैं तो या तो बेअसर हो चुकी है या फिर वायरस को फैलने में मदद करती है जैसे कि फ्लू वायरस की वैक्सीन। बच्चों को दिए जाने वाली वैक्सीन डीटीएपी केवल बी.परट्यूसिस से लड़ने के लिए बनाई गई है जो कि बेहद ही मामूली बीमारी है। परन्तु डीटी एपी की वैक्सीन फेफड़ों के इंफेक्शन को आमंत्रित करती है जो दीर्घकाल में व्यक्ति की इम्यूनिटी पॉवर को कमजोर कर देती है।

3. कैन्सर हमेशा कैन्सर ही नहीं होता यूं तो कैन्सर स्त्री-पुरूष दोनों में किसी को भी हो सकता है लेकिन ब्रेस्ट कैन्सर की पहचान करने में अधिकांशतया डॉक्टर गलती कर जाते हैं। सामान्यतया स्तन पर हुई किसी भी गांठ को कैंसर की पहचान मान कर उसका उपचार किया जाता है जो कि बहुत से मामलों में छोटी-मोटी फुंसी ही निकलती है। उदाहरण के तौर पर हॉलीवुड अभिनेत्री एजेलिना जॉली ने मात्र इस संदेह पर अपने ब्रेस्ट ऑपरेशन करके हटवा दिए थे कि उनके शरीर में कैन्सर पैदा करने वाला जीन पाया गया था।

4. दवाईयां कैंसर पैदा करती हैं ब्लड प्रेशर या रक्तचाप (बीपी) की दवाईयों से कैन्सर होने का खतरा तीन गुना बढ़ जाता है। ऎसा इसलिए होता है क्योंकि ब्लडप्रेशर की दवाईयां शरीर में कैल्सियम चैनल ब्लॉकर्स की संख्या बढ़ा देता है जिससे शरीर में कोशिकाओं के मरने की दर बढ़ जाती है और प्रतिक्रियास्वरूप कोशिकाएं बेकार होकर कैंसर की गांठ बनाने में लग जाती हैं।


5. एस्पिरीन लेने से शरीर में इंटरनल ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है हॉर्ट अटैक तथा ब्लड क्लॉट बनने से रोकने के लिए दी जाने वाली दवाई एस्पिरीन से शरीर में इंटरनल ब्लीडिंग का खतरा लगभग 100 गुणा बढ़ जाता है। इससे शरीर के आ ंतरिक अंग कमजोर होकर उनमें रक्तस्त्राव शुरू हो जाता है। एक सर्वे में पाया गया कि एस्पिरीन डेली लेने वाले पेशेंट्स में से लगभग 10,000 लोगों को इंटरनल ब्लीडिंग का सामना करना पड़ा।

6. एक्स-रे से कैन्सर होता है आजकल हर छोटी-छोटी बात पर डॉक्टर एक्स-रे करवाने लग गए हैं। क्या आप जानते हैं कि एक्स-रे करवाने के दौरान निकली घातक रेडियोएक्टिव किरणें कैंसर पैदा करती हैं। एक मामूली एक्स-रे करवाने में शरीर को हुई हानि की भरपाई करने में कम से कम एक वर्ष का समय लगता है। ऎसे में यदि किसी को एक से अधिक बार एक्स-रे क रवाना पड़े तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

7. सीने में जलन की दवाई आंतों का अल्सर साथ लाती है बहुत बार खान-पान या हवा-पानी में बदलाव होने से व्यक्ति को पेट की बीमारियां हो जाती है। इनमें से एक सीने में जलन का होना भी है जिसके लिए डॉक्टर एंटी-गैस्ट्रिक दवाईयां देते हैं। इन मेडिसीन्स से आंतों का अल्सर होने की संभावना बढ़ जाती है, साथ ही साथ हडि्डयों का क्षरण होना, शरीर में विटामिन बी12 को एब्जॉर्ब करने की क्षमता कम होना आदि बीमारियां व्यक्ति को घेर लेती हैं। सबसे दुखद बात तब होती है जब इनमें से कुछ दवाईयां बीमारी को दूर तो नहीं करती परन्तु साईड इफेक्ट अवश्य लाती हैं।

8. दवाईयों और लैब-टेस्ट से डॉक्टर्स कमाते हैं मोटा कमीशन यह अब छिपी बात नहीं रही कि डॉक्टरों की कमाई का एक मोटा हिस्सा दवाईयों के कमीशन से आता है। यहीं नहीं डॉक्टर किसी खास लेबोरेटरी में ही मेडिकल चैकअप के लिए भेजते हैं जिसमें भी उन्हें अच्छी खासी कमाई होती है। कमीशनखोरी की इस आदत के चलते डॉक्टर अक्सर जरूरत से ज्यादा मेडिसिन दे देते हैं।


9. जुकाम सही करने के लिए कोई दवाई नहीं है नाक की अंदरूनी त्वचा में सूजन आ जाने से जुकाम होता है। अभी तक मेडिकल साइंस इस बात का कोई कारण नहीं ढूंढ पाया है कि ऎसा क्यों होता है और ना ही इसका कोई कारगर इलाज ढूंढा जा सका है। डॉक्टर जुकाम होने पर एंटीबॉयोटिक्स लेने की सलाह देते हैं परन्तु कई अध्ययनों में यह साबित हो चुका है कि जुकाम 4 से 7 दिनों में अपने आप ही सही हो जाता है। जुकाम पर आपके दवाई लेने का कोई असर नहीं होता है, हां आपके शरीर को एंटीबॉयोटिक्स के साईड-इफेक्टस जरूर झेलने पड़ते हैं।

10. एंटीबॉयोटिक्स से लिवर को नुकसान होता है मेडिकल साइंस की सबसे अद्भुत खोज के रूप में सराही गई दवाएं एंटीबॉयोटिक्स हैं। एंटीबॉयोटिक्स जैसे पैरासिटेमोल ने व्यक्ति की औसत उम्र बढ़ा दी है और स्वास्थ्य लाभ में अनूठा योगदान दिया है, लेकिन तस्वीर के दूसरे पक्ष के रूप में एंटीबॉयोटिक्स व्यक्ति के लीवर को डेमेज करती है। यदि लंबे समय तक एंटीबॉयोटिक्स का प्रयोग कि या जाए तो व्यक्ति की किडनी तथा लीवर बुरी तरह से प्रभावित होते हैं और उनका ऑपरेशन करना पड़ सकता है।
11. अनेक डाक्टर खुद योग और देसी दवाओं से अपना और अपने परिवार का इलाज करवाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि आयुर्वेद और योग के साइड इफ़ेक्ट नही हैं और इससे रोग भी जड़ से समाप्त होते हैं.

12. बाइपास सर्जरी जो कि हृदयघात (दिल का दौरा) के रोगियों के लिए बताई जाती है वो डाक्टर खुद अपने लिए कभी नही सोचते क्योंकि एक तो यह स्थाई इलाज नही है दूसरा इस से दौरा फिर से पड़ने के मौके कम नही होते, खुद पर ऐसी समस्या आने पर डाक्टर घिया (लौकी) का रस या अर्जुन की छाल का काढ़ा बना कर पीते हैं या रोज प्राणायाम और योग करते हैं...!!