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गुरुवार, 3 मई 2018

जानिए आखिर क्यों अपने पति से छिपाकर ये काम करती हैं पत्नियां! जानकर उड़ जाएगें होश

जानिए आखिर क्यों अपने पति से छिपाकर ये काम करती हैं पत्नियां! जानकर उड़ जाएगें होश


शादीशुदा ज़िन्दगी में मिठास बनाए रखने के लिए उसमें कभी-कभी रोमांस का तड़का लगाना बेहद जरुरी है. जितने भी दिन शादीशुदा जोड़ों में रोमांस रहता है उतने दिन उनके रिश्ते में कोई भी दिक्कत नहीं आती, लेकिन जैसे ही उनके बीच रोमांस खत्म हो जाता है तब उनके रिश्ते में परेशानियां आनी शुरू हो जाती है, लेकिन एक रिसर्च अनुसार हम आपको बता दें कि इसी रोमांस के बीच पत्नी की कुछ ऐसी बातें हैं जो कि अपने पति से हमेशा छिपाकर रखती है, वजह जानकर चोक जाएगें आप..

दरअसल आपको बात दें कि अधिकतर महिलाये अपने पति से कुछ ना कुछ बात छिपाकर रखती है उन्ही में से कुछ ऐसी बातें जो कि ना बताने से पति पत्नी के रिश्तों में दरार पड़न लगती है.इसीलिए हर एक शादीशुदी पुरुष को ध्यान रखा चाहिए कि अगर आपकी पत्नी आजकल चुपचाप रहती हैं तो जरुर वह आपसे कुछ बात छिपा रही है.

महिलाएं ज्यादतार अपने निजी अंगो से जुड़ी बिमारी के बारे में छुपाना पसंद करती हैं.. साथ ही वह अपने पति से शारीरक सबंध से संबंधित कोई भी बाते खुलकर बोल नहीं पाती हैं, यदि उनको कोई समस्या भी है तो वह पति की वजाह अपनी सहेली को बताना  पसंद करती हैं.बहुत बार ऐसा भी होता है  कि वह अपनी बात को छुपाने के लिए अपने पति से झुठ तक बोल देती है, जिससे उनके रिश्ते खटास हो सकती है.

महिलाएं वैवाहिक जीवन के विभिन्न पड़ावों पर अपने पति से न चाहते हुए भी काई बातों को छिपाने के लिए झूठ बाेलती हैं,सभी पत्नियों की सबसे बुरी बात होती है कि वह अपनी छोटी-मोटी परेशानियों नजरअंदाज कर देती हैं, और फिर आगे बड़ी समस्या होने का डर रहता है.

वहीं अगर पत्नी का शारीरक संबध बनाने का मन भी होता है, तो वह अपने पति से इस बात को भी कहने से शर्माती है, लेकिन पुरुषों में ऐसा नहीं होता है. ज्यदातर सभी महिलाओं  को कुछ ना कुछ बाजार से खरीदना पसंद होता है लेकिन वह इस बात को भी पति से छिपाती है, है कि वह बाजार से क्या खरीदकर लाई हैं, इसके अलावा भी पत्नियां बच्चों की कमियों को भी पति को बताना पसंद नहीं करती हैं, ताकि घर का माहौल खराब ना हो.

जानिये शारीरिक संबंध बनाने के बाद क्यों जरुरी होता है पेशाब करना !!

जानिये शारीरिक संबंध बनाने के बाद क्यों जरुरी होता है पेशाब करना !!


पति और पत्नी के रिश्ते में और ज्यादा मजबूती लाने के लिए यौन संबंध बनाना बहुत ज्यादा जरुरी है. आजकल बिजी होने की वजह से बहुत से लोग अपनी पार्टनर को उतना समय नहीं दें पाते जितना उन्हें देना चाहिए. ये बात तो सभी को अच्छी तरह से ही पता है कि किसी भी रिश्ते में तभी मजबूती आती हैं जब आप अपने पार्टनर को पूरी तरह से अपना समय देते हैं. आपको अपने पार्टनर को भावनात्मक और शारीरिक दोनों ही तरह से समय देना चाहिए.

इसके लिए बहुत ज्यादा जरुरी है कि कपल्‍स अपनी सेक्स लाइफ को अच्छी बनाने के आलावा शारीरिक संबंध बनाने की प्रक्रिया को भी साफ सुथरा बनाए, जिससे आगे जाकर दोनों में से किसी को भी कोई दिक्कत ना हो, क्योंकि बहुत बार  उत्सुकता में शारीरिक संबंध बनाने के दौरान लोग साफ-सफाई पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दे पाते, जिसकी वजह से आने वाले भविष्य में उनके स्वस्थ पर बुरा असर पड़ता है. आज हम आपको कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं जो बातें आपको यौन संबंध बनाते समय जरुर ध्यान में रखनी चाहिए.

व्यक्ति के जीवन में शारीरिक संबंध बनाना जितना ज्यादा जरुरी है उतना ही जरुरी है शारीरिक संबंध बनाते समय अपने प्राइवेट पार्ट का ध्यान रखना. अगर आप यौन संबंध बनाते समय अपने प्राइवेट पार्ट को साफ नहीं रखते तो इससे आने वाले समय में आपके पार्टनर को बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है, क्योंकि व्यक्ति के प्राइवेट पार्ट बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं इसलिए इनका ख्याल रखना बेहद जरुरी है.

जब भी आप किसी से यौन संबंध बनाए तो उसके एकदम बाद अपने गुप्तांगों को अच्छी तरह से धो लें. ऐसा करने से आपके और अपने पार्टनर के शरीर में संक्रमण की संभावना बहुत कम हो जाती हैं.

बहुत बार देखा गया है कि यौन संबंध बनाने के बाद स्त्रियों को पेशाब में संक्रमण की शिकायत हो जाती हैं, जो उनके पार्टनर के शरीर से ट्रांसमिट होती हैं, क्योंकि जैसे की आप सभी जानते हैं कि पुरुषों में शुक्राणु और पेशाब करने का एक ही रास्ता होता है. जिससे अगर उनके पेशाब में किसी भी तरह का कोई संक्रमण होता है तो ये संक्रमण यौन संबंध बनाने के समय महिला के अंदर चला जाता है. इसके उल्टे महिलाओं में पेशाब करने और प्रजनन दोनों का रास्ता अलग-अलग होता है जिसकी वजह से पुरुष को संक्रमण होने का खतरा बहुत कम होता है.

इसलिए कहा जाता है कि जब भी किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाये तो संबंध बनाने के बाद पुरुष और महिला दोनों को ही पेशाब करना चाहिए. ऐसा करने से गुप्तांगो में संभोग के समय गए संक्रमण को गर्भाशय तक पहुंचने से रोकने में मदद मिलती है.

रविवार, 8 अप्रैल 2018

माथे पर तिलक लगाने के बाद क्यों लगाया जाता है चावल

माथे पर तिलक लगाने के बाद क्यों लगाया जाता है चावल


हिंदू धर्म में माथे पर कुमकुम का तिलक लगाने का विशेष महत्व है। पूजा-पाठ, त्योहार, शादी और जन्मदिन जैसे आयोजनों में तिलक लगाया जाता है।

हिंदू धर्म में धार्मिक कार्य के दौरान तिलक लगाया जाता है। तिलक के बाद उस पर चावल भी लगाया जाता है। क्या आप जानते हैं तिलक के बाद चावल क्यों लगाया जाता है। नहीं जानते तो हम आपको बताने जा रहे हैं इसके पीछे का कारण।

तिलक के बाद चावल लगाने के पीछे वैज्ञानिक कारण माना जाता है। कहा जाता है। तिलक लगाने से दिमाग में शाति एवं शीतलता बनी रहती है और चावल लगाने का कारण शुद्धता और पवित्रता के रूप में होता है। हिंदू धर्म में चावल को शुद्धता का प्रतीक माना गया है। चावल को हवन में देवताओं को चढ़ाया जाने वाला शुद्ध अन्न माना जाता है।

चावल को सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है धार्मिक अनुष्ठानों में चावल के प्रयोग से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। पूजा में कुमकुम के तिलक के ऊपर चावल के दाने इसलिए लगाए जाते हैं, ताकि हमारे आसपास जो भी नकारात्मक ऊर्जा उपस्थित हो, वह सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाए।

सोमवार, 19 मार्च 2018

क्यों मनाया जाता हैं गणगौर का पर्व और जानिए इसे मनाने का तरीका

क्यों मनाया जाता हैं गणगौर का पर्व और जानिए इसे मनाने का तरीका


राजस्थानी मारवाड़ियों का पर्व मनाने में जुटी महिलाओं का साज-बाज अब आपको सिर्फ राजस्थान में ही नहीं यूपी, बिहार, झारखंड, असम, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखंड और मध्यप्रदेश समेत पूरे भारत में देखने को मिलता है. अब इसे परंपरा का विस्तार कहे या आस्था “गणगौर पूजा” भारत के प्रमुख त्यौहारों में शुमार हो चुका है और उसी श्रद्धा भक्ति और उत्साह से मनाया जाता है होली के दूसरे दिन से शुरू यह पर्व पूरे 16 दिन तक मनाया जाता है. पर्व चेत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को समाप्त होता है. इस पर्व पर कुंवारी कन्याएं व विवाहित महिलाएं शिवजी(ईसर) व पार्वती(गणगौर) की पूजा करती है. पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए गीत गाती है. जहां कुंवारी लड़कियां इस व्रत को मनपसंद वर पाने की कामना से करती है, तो वहीं विवाहित महिलाएं इसे पति की दीर्घायु की कामना के लिए करती है.

घेवर के बिना अधूरा है गणगौर 
गणगौर का उत्सव घेवर के बिना अधूरा है खीर, चूरमा, पूरी, मठरी से इस ईसर गणगौर को पूजा जाता है आटे और बेसन के घेवर बनाए जाते हैं और गणगौर माता को चढ़ाए जाते हैं गणगौर पूजन का स्थान समूह में किसी एक स्थान अथवा घर में किया जाता है गणगौर की पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा होते हैं

16 अंक का महत्व 
गणगौर पूजा में 16 अंक का विशेष महत्व होता है काजल, रोली, मेहंदी से 16-16 बिंदिया गणगौर के गीत गाते हुए लगाते हैं. गणगौर को चढ़ने वाले प्रसाद फल व सुहाग की सामग्री 16 के अंक में चढ़ाई जाती है वही पूजा भी 16 दिनों की होती है.

रोज सुबह होती है पूजा
गणगौर माता को सजाकर 16 दिन तक दूध और सिंदूर से उनकी पूजा होती है 16 दिन बाद सारी महिलाएं इकट्ठे होकर घुघरी बनाती है और सबके घरों में बांटकर आती है.

आधुनिक पीढ़ी भी रंग में रंगी
पुरानी पीढ़ियों से मिले रीति-रिवाजों को आज आधुनिक पीढ़ी भी अपना रही है यही वजह है कि विदेशों में नौकरी करने पहुंचे आज के बच्चे भी अपने परिवारों से सीखें रीति रिवाजों को मिलो दूर भी उत्साह से निभा रहे हैं

महिलाओं का उत्सव
गणगौर उत्सव स्त्रियों का ही शुभ माना जाता है. असल में गणगौर के बहाने महिलाएं एक- दूसरे से मिलती है और अपने अपने सुख-दुख बाँटती है. साथ ही रोजमर्रा के जीवन से कुछ अलग दिन बिताती है. गणगौर शिव- पार्वती के प्रेम में मित्रों की तरह की ग्रहस्त जीवन की परिकल्पना की आकांक्षाओं का चित्र है. इस पूजा में कन्या और विवाहित स्त्रियां मिट्टी के ईसर और गौर बनाती है उनको सुंदर पोशाक पहन आती है श्रृंगार कर आती है और खुद भी संवरती है. कहते हैं इस दिन भगवान शिव और पार्वती ने समस्त स्त्रियों को सौभाग्य का वरदान दिया था यही वजह है कि सभी महिलाएं पूरी शिद्दत से गणगौर की पूजा करती है.

ईसर गौर के रूप में शिव पार्वती का पूजन
ईसर गौरव को शिव पार्वती का प्रतीक मानकर उनकी पूजा अर्चना की जाती है इसलिए इसे शिव और गौरी की आराधना का पर्व कहा जाता है. अखंड सौभाग्य और पीहर, ससुराल की समृद्धि की कामना से जुड़ा गणगौर पूजन एक जरूरी वैवाहिक रस्म के रूप में प्रचलित है. नई नवेली दुल्हन जब अपने पति की मनुहार करती है कि उसे गणगौर पूजने जाने दे तो उस भाव को लेकर यह प्यारा सा लोक गीत गाया जाता है.

गीत ही है इस पर्व की पहचान
इस पर्व पर प्रार्थना स्वरुप गाने के लिए हर रिश्ते को संबोधित करने वाले मर्मस्पर्शी गीत बने हैं. गणगौर की पूजा में मन के हर भाव को शब्द देने वाले लोकगीतों की लंबी सूची है अलग-अलग अवसरों पर मन को छूने वाले अलग-अलग लोकगीत गाए जाते हैं असल में देखा जाए तो यह गीत ही गणगौर पूजन के मंत्र है. जिनमें महिलाएं के भाव झलक पड़ते हैं तभी तो यह त्यौहार की पूजा अर्चना के अलावा स्त्रीत्व के भी कहीं खुशहाल रंग समेटे हैं.

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

जानिए क्यों होती है लड़कियों की अंडरवियर में अंदर की तरफ छोटी सी पॉकेट

जानिए क्यों होती है लड़कियों की अंडरवियर में अंदर की तरफ छोटी सी पॉकेट


इस दुनिया में तकरीबन-तकरीबन हर मुद्दे पर ही सवाल बन सकता है, कि आखिर ये चीज़ ऐसी क्यों है? ये वैसी क्यों है? पेड़ सीधे क्यों होते हैं? फल मीठे क्यों होते हैं? वगैरह-वगैरह. हम आपके हर उन सवालों का जवाब तो शायद नहीं दी सकते लेकिन इनके अलावा भी कई ऐसे सवाल होते हैं जिनके जवाब होते इसी दुनिया में हैं लेकिन हमें पता नहीं होते, बस आज ऐसे ही एक सवाल का जवाब हम आपको यहाँ देने आये हैं. सवाल है कि महिलाओं के अंतर्वस्त्र (पैंटी) में एक छोटी सी जेब होती है, लेकिन वो किस वजह से होती है?

जानिए इसका हैरान कर देने वाला जवाब:
शर्ट में जेब, पेंट में जेब, शॉर्ट्स में जेब, ड्रेस में जेब यहाँ तक की कुर्ता-सलवार में जेब तो आपने सुनी होगी लेकिन अगर हम आप से कहें कि महिलाओं के अंतर्वस्त्र में भी एक जेब होती है तो यकीनन आप भी सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि भाई वहां जेब का क्या काम? तो हम आपको बताते हैं कि दरअसल वो जेब वहां क्यों बनायीं जाती है. दरअसल लड़कियों की पेंटी का अंदर का भाग काफी सॉफ्ट बनाया जाता है और पेंटी की सिलाई से स्किन के घिसने और कई परेशानी आती है इस कारण के जेब बनाई जाती है.

पूरी बात समझने के लिए ये जानना है ज़रूरी
दरअसल होता ये है कि लड़कियों की पेंटी को ऐसे बनाया जाता है की पॉकेट के दोनों तरफ से अंत में सिल दिया जाए लेकीन इसमें एक को सिलकर एक पॉकेट नुमा जेब को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है जिसे वो पॉकेट जैसी लगती है.

हाँ लेकिन ये जेब नुमा चीज़ हर पैंटी में नहीं होती है. अमूमन तौर पर ये ब्रांडेड कपड़ों में ही पाई जाती है.

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

क्या आपको पता है शिवलिंग का रहस्य और क्यों की जाती है इसकी पूजा?

क्या आपको पता है शिवलिंग का रहस्य और क्यों की जाती है इसकी पूजा?

पूरे भारत में बारह ज्योर्तिलिंग हैं जिसके विषय में मान्यता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं हुई. इनके अलावा देश के विभिन्न भागों में लोगों ने मंदिर बनाकर शिवलिंग को स्थापित किया है और उनकी पूजा करते हैं. लिंग को शिव का निराकार रूप माना जाता है, जबकि उनके साकार रूप में उन्हें भगवान शंकर मानकर पूजा जाता है. आदि काल से ही मनुष्य शिव के लिंग की पूजा करते आ रहे हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि सभी देवों में महादेव के लिंग की ही पूजा क्यों होती है. इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं हैं.

शिवलिंग का रहस्य
शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है! अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं.

वेदों में मिलता है उल्लेख
वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है. यह सूक्ष्म शरीर 17 तत्वों से बना होता है. मन, बुद्धि, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु. वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं. इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है.

शिव पुराण के अनुसार
शिव पुराण में शिवलिंग की पूजा के विषय में जो तथ्य मिलता है वह तथ्य इस कथा से अलग है. शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है. इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरूष और निराकार ब्रह्म हैं. इसी के प्रतीकात्मक रूप में शिव के लिंग की पूजा की जाती है. भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था. इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ. इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई.

पौराणिक कथा के अनुसार
जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया. उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए. समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया. उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी चली आ रही है.

वैज्ञानिक कारण
हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने लिंग और योनी मिले हैं. एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया. यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति के पूजक थे. वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति लिंग और योनी से हुई है. इसी से लिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी.

रविवार, 14 जनवरी 2018

आखिर क्यों हर साल एक ही तारीख को मनाई जाती है मकर संक्रांति, जानिए इसके बारे में कुछ और रोचक तथ्य

आखिर क्यों हर साल एक ही तारीख को मनाई जाती है मकर संक्रांति, जानिए इसके बारे में कुछ और रोचक तथ्य


हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति पूरे भारतवर्ष और नेपाल में मुख्य फसल कटाई के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन उत्सव के रूप में स्नान, दान किया जाता है। तिल और गुड के पकवान बांटे जाते है। पतंग उड़ाए जाते हैं। इस पर्व को सूर्य-शनि से जुड़ा पर्व भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश करेंगे तथा दो माह तक रहते हैं। मकर संक्रांति मनाते सब हैं पर ज्यादातर लोग इस पर्व के बारे में कुछ रोचक तथ्य है जो नहीं जानते। आज हम वो ही रोचक तथ्य आपके लिए लेकर आए है

1 . मकर संक्रांति क्यों कहते हैं?
मकर संक्रांति पर्व मुख्यतः सूर्य पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। एक राशि को छोड़ के दूसरे में प्रवेश करने की सूर्य की इस विस्थापन क्रिया को संक्रांति कहते है, चूँकि सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इस समय को मकर संक्रांति कहा जाता है।

2 . सूर्य उत्तरायण 
इस दिन सूर्य दक्षिणायन से अपनी दिशा बदलकर उत्तरायण हो जाता है अर्थात वैज्ञानिक पहलुओं से देखें तो ठंड के मौसम जाने का सूचक है और मकर संक्रांति पर दिन-रात बराबर अवधि के होते हैं। इसके बाद से दिन बडे हो जाते हैं और मौसम में गर्माहट आने लगती है। फसल कटाई अथवा बसंत के मौसम का आगमन भी इसी दिन से मान लिया जाता है।

3 . पतंग महोत्सव 
यह पर्व सेहत के लिहाज से बड़ा ही फायदेमंद है। सुबह-सुबह पतंग उड़ाने के बहाने लोग जल्द उठ जाते हैं वहीं धूप शरीर को लगने से विटामिन डी मिल जाता है। इसे त्वचा के लिए भी अच्छा माना गया है। सर्द हवाओं से होने वाली कई समस्याएं भी दूर हो जाती हैं।

4 . तिल और गुड़ 
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारी जल्दी लगते हैं। इस लिए इस दिन गुड और तिल से बने मिष्ठान खाए जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्व के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। इसलिए इस दिन खासतौर से तिल और गुड़ के लड्डू खाए जाते हैं।

5 . स्नान, दान, पूजा 
माना जाता है की इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्याग कर उनके घर गए थे। इसलिए इस दिन को सुख और समृद्धि का माना जाता है। और इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा आदि करने से पुण्य हजार गुना हो जाता है। इस दिन गंगा सागर में मेला भी लगता है।

6 . फसलें लहलहाने का पर्व 
यह पर्व पूरे भारत और नेपाल में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती है और खेतो में रबी की फसलें लहलहा रही होती है। खेत में सरसो के फूल मनमोहक लगते हैं। पूरे देश में इस समय ख़ुशी का माहौल होता है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है। क्षेत्रो में विविधता के कारण इस पर्व में भी विविधता है। दक्षिण भारत में इस त्यौहार को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे लोहड़ी कहा जाता है। मध्य भारत में इसे संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण, माघी, खिचड़ी आदि नाम से भी जाना जाता है।

7. हर साल एक ही तारीख क्यों?
यही त्योहार ऐसा है जो हर साल एक ही तारीख को आता है। क्योंकि यह त्योहार सोलर कैलेंडर को फालो करता है। दूसरे त्योहारों की गणना चंद्र कैलेंडर के आधार पर होती है। यह साइकल हर 8 साल में एक बार बदलती है। उसी के एक दिन बाद यह त्योहार मनाया जाता है। एक गणना के मुताबिक 2050 से यही त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाएगा। फिर हर आठ सालों में 16 जनवरी को मनाया जाएगा। 

8. मलमास समाप्त होता है 
इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्राम्भ होने के कारण लोग दान पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं।

9. महाभारत से संबंध 
महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का दिन ही चयन किया था। 

10. भगवान विष्णु ने किया असुरों का अंत 
इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी व सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। 

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

बेवजह नहीं मारा जाता जलती हुई लाश के सर पर डंडा, इसके पीछे है ये बड़ी वजह !

बेवजह नहीं मारा जाता जलती हुई लाश के सर पर डंडा, इसके पीछे है ये बड़ी वजह !


फैशन और टेक्नोलॉजी के इस युग में अब पीछे की तरफ जाना नामुमकिन है. लेकिन इस नए दौर में अब भी हिंदू धर्म से जुड़ी कुछ बातें ऐसी हैं जिनको वैज्ञानिक भी मानने से इंकार नहीं कर सकते. हिंदू  धर्म में यूं तो कई रिवाज़ हैं जिसमें बदलते वक़्त के साथ बदलाव आया है. लेकिन कुछ रिवाज़ ऐसे भी हैं जो सदियों से चले आ रहे हैं और आगे भी ऐसे ही चलने की उम्मीद है. आज हम हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण रीती के बारे में बात करने जा रहे हैं, जिसे अंतिम क्रिया के नाम से जाना जाता है. हिंदू धर्म में लोगों के मरने के बाद उनकी अंतिम क्रिया की जाती है और इस अंतिम क्रिया का अपना एक अलग ही महत्व होता है.

हिंदू धर्म के अनुसार व्यक्ति के मरने के बाद महिलाएं शमशान घाट नहीं जाती. मृत इंसान के साथ गहरा रिश्ता होने के बावजूद महिलाओं को शमशान घाट नहीं जाने दिया जाता. लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बदला है सोसाइटी में भी बदलाव आया है. मॉडर्न सोसाइटी के कुछ लोग महिलाओं को अपने साथ शमशान घाट ले जाते हैं. उन्हें इस बात में कोई आपत्ति नज़र नहीं आती.
ये भी पढ़िए : जाने क्या है नजर लगने के लक्षण और उन्हें उतारने के अचूक उपाय

आखिर क्यों महिलाओं को शमशान घाट नहीं जाने दिया जाता :
पर आखिर क्यों महिलाओं को शमशान घाट नहीं जाने दिया जाता? क्या वजह होती है इसके पीछे? दरअसल, कहते हैं कि महिलाओं का दिल पुरुषों के मुकाबले बेहद नाज़ुक होता है. यदि शमशान घाट पर कोई महिला अंतिम संस्कार के वक़्त रोने या डरने लग जाए तो मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलती. कहते हैं कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है और महिलाओं का कोमल दिल यह सब देख नहीं पाता. एक मान्यता की मानें तो शमशान घाट पर आत्माओं का आना-जाना लगा रहता है और ये आत्माएं महिलाओं को अपना शिकार पहले बनाती हैं.

जलती हुई लाश के सर पर डंडा :
इसके अलावा महिलाएं घर पर इसलिए रहती हैं ताकि शमशान घाट से वापस आने पर वह पुरुषों का हाथ पैर धो कर उन्हें पवित्र कर सकें. अंतिम संस्कार की एक प्रथा के दौरान मरने वाले के बेटे को शव के सर पर डंडे से मारने के लिए कहा जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मरने वाले के पास यदि कोई तंत्र विद्या है तो कोई दूसरा तांत्रिक उसकी विद्या को चुराकर उसकी आत्मा को अपने वश में ना कर सके. आत्मा को वश में कर लेने पर वह उससे कोई भी बुरा काम करवा सकता है.
इतना ही नहीं, हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के बाद लोग अपना सिर भी मुंडवा देते हैं. सिर मुंडवाने की प्रथा घर के सभी पुरुषों के लिए अनिवार्य है. इसके विपरीत महिलाओं के लिए ऐसा कोई नियम-कानून  नहीं है इसलिए उन्हें अंतिम क्रिया की प्रक्रिया से दूर रखा जाता है.

शव को शमशान ले जाते समय क्यों लिया जाता है ये नाम :
हिंदू धर्म में भगवान राम की भी बहुत मान्यता है. कहते हैं कि अगर किसी ने भगवान राम के नाम का 3 बार जप कर लिया तो यह अन्य किसी भगवान के 1000 बार नाम जपने के बराबर है. इसलिए अक्सर आपने देखा होगा कि शव ले जाते वक़्त लोग ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए जाते हैं. इस वाक्य का अर्थ है कि ‘सत्य भगवान राम का नाम है. यहां राम ब्रम्हात्म यानी की सर्वोच्च शक्ति की अभिव्यक्ति करने के लिए निकलता है. इस दौरान मृतक के शरीर का कोई अस्तित्व नहीं रहता. आत्मा अपना सब कुछ त्याग कर भगवान के शरण में चली जाती है और यही अंतिम सत्य है!